झुकना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

झुकना क्रि॰ अ॰ [सं॰ युज्, युक, हिं॰ जुक]

१. कीसी खड़ी चीज के ऊपर के भाग का नीचे की ओर टेढ़ा होकर लटक आना । ऊपरी भाग का नीचे की ओर लटकना । निहुरना । नवना । जैसे, आदमी का सिर या कमर झुकना । मुहा॰— झुक झुक पड़ना= नशे या नींद आदि के कारण किसी मनुष्य का सीधा या अच्छी तरह खड़ा या बैठा न रह सकना । उ॰— अमिय हलाहल मदभरे सेत स्याम रतनार । जियत मरत झुकि झुकि परत जेहि चितवत एत बार ।—(शब्द॰) ।

२. किसी पदार्थ के एक या दोनों सिरों का किसी ओर प्रवृत्त होना । जैसे, छड़ी का झुकना ।

३. किसी खड़े या सीधे पदार्थ का किसी और प्रवृत्त होना । जैसे, खंभे या तख्ते का झुकना ।

४. प्रवृत्त होना । दत्तचित्त होना । रुजू होना । मुखातिब होना ।

५. किसी चीज को लेने के लिये आगे बढ़ना ।

६. नम्र होना । विनीत होना । अवसर पड़ने पर अभिमान या उग्रता न दिखलाना । संयो॰ क्रि॰ —जाना ।—पड़ना ।

७. क्रुद्ध होना । रिसाना । उ॰— (क) सुनि प्रिय वचन मलिन मनु जानी । झुकी रानि अवरहु अरगानी ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) अब झूठो अभिमान करति सिय झुकति हमारे ताँई । सुख ही रहसि मिली रावण को अपने सहज सुभाई ।— सूर (शब्द॰) । (ग) अनत वसे निसि की रिसनि उर बर रह्यो बिसेखि । तऊ लाज आई झुकत खरे लजौहैं देखि ।— बिहारी (शब्द॰) । †

८. शरीरांत होना । मरना ।