टाँगना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

टाँगना संज्ञा पुं॰ [सं॰ तुरंगम या हिं॰ ठेंगना] छोटी जाति का घोड़ा । वह घोड़ा जो बहुत कम ऊँचा हो । पहाड़ी टट्टू । विशेष—नैपाल और बरमा के टाँगन बहुत मजबूत और तेज होते हैं ।

टाँगना क्रि॰ स॰ [हिं॰ टँगना]

१. किसी वस्तु को किसी ऊँचे आधार से बहुत थोड़ा सा लगाकर इस प्रकार अटकाना या ठहराना कि उसका प्राय: सब भाग उस आधार से नीचे की ओर हो ।

२. किसी वस्तु को दूसरी वस्तु से इस प्रकार से बाँधना या फँसाना अथवा उसपर इस प्रकार टिकना या ठहराना कि उसका (प्रथम वस्तु का) सब (या बुहत सा) भाग नीचे की ओर लटकता रहे । किसी वस्तु को इस प्रकार ऊँचे पर ठहराना कि उसका आश्रय ऊपर की और हो । लटकाना । जैसे, (खूँटी पर) कपड़ा टाँगना, परदा टाँगना, झाड़ टाँगना । विशेष—यदि किसी वस्तु का बहुत सा अंश आधार के नीचे लटकता हो, तो उसे 'टाँगना' नहीं कहेंगे । 'टाँगना' और 'लटकाना' में यह अंतर है कि 'टाँगना' क्रिया में वस्तु के फँसाने, टिकाने या ठहराने का भाव प्रधान है और 'लटकाना' में उसके बहुत से अंश को नीचे की ओर दूर तक पहुँचाने का भाव है । जैस,—कुएँ में रस्सी लटकाना कहेंगे रस्सी टाँगना नहीं कहेंगे । पर टाँगना के अर्थ में लटकाना का भी प्रयोग होता है । संयो॰ क्रि॰—देना ।

२. फाँसी चढ़ाना । फाँसी लटकाना ।