ठकोरी

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ठकोरी संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ टेकना, ठेकना + औरी (प्रत्य॰)]

१. सहारा लेने की लकड़ी । उ॰—(क) भक्त भरोसे राम के निधरक ऊँची दीठ । तिनको करम न लागई राम ठकोरी पीठ ।—कबीर (शब्द) । (ख) देखादेखी पकरिया गई छिनक में छूटि । कोई बिरला जन ठाहरै जासु ठकोरी पूठि ।— कबीर (शब्द॰) । विशेष—यह लकड़ी अड्डे के आकार की होती है । पहाड़ी लोग जब बोझ लेकर चलते चलते थक जाते है तब इस लकड़ी को पीठ या कमर से भिड़ाकर उसी के बल पर थोड़ी देर खड़े हो जाते हैं । साधु लोग भी इसी प्रकार की लकड़ी सहारा लेने के लिये रखते है ओर कभी कभी इसी के सहारे बैठते है । इसे वे बैरागिन या जोगिनी भी कहते हैं ।