ठग

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ठग संज्ञा पुं॰ [सं॰ स्थग] [ स्त्री॰ ठगनी, ठगिन ठगिनी]

१. धोखा देकर लोगों का धन हरण करनेवाला व्यक्ति । वह लुटेरा जो छल और धूर्तता से माल लूटता है । भुलावा देकर लोगों का माल छीननेवाला । उ॰—जग हटवारा स्वाद ठग, माया वेश्या लाय । राम नाम गाढ़ा गहो जनि कहुँ जाहु ठपाय ।—कबीर (शब्द॰) । विशेष—डाकू और ठग में यह अंतर है कि डाकू प्रायः जबरदस्ती बल दिखाकर माल छीनते हैं पर ठग अनेक प्रकार की धूर्तता करते हैं । भारत में इनका एक अलग संप्रदाय सा हो गया था । मुहा॰—ठग लगना = ठगों का आक्रमण करना या पीछे पड़ना । जैसे,—उस रास्ते में बहुत ठग लगते हैं । ठग के लाड़ू = दे॰ 'ठगलाड़ू' । यौ॰—ठगमूरी । ठगमोदक । ठगलाड़ू । ठगविद्या ।

२. छली । धूर्त । धोखेबाज । वंचक । प्रतारक ।