ठानना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ठानना † क्रि॰ स॰ [सं॰ अनुष्ठान, हिं॰ ठान अथवा सं॰ स्थापन > आ॰ ठाअन, > ठान + ना (प्रत्य॰)]

१. किसी कार्य को तत्परता के साथ आरंभ करना । द्दढ़ संकल्प के साथ प्रारंभ करना । अनुष्ठित करना । छेड़ना । जैसे; काम ठानना, झगड़ा ठानना, बैर ठानना, युद्ध ठानना, यज्ञ ठानना । उ॰— (क) तब हरि और खेल इक ठान्यौ ।—नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ २८५ । (ख) तिन सो कह्यो पुत्र हित हय मख हम दीनो हैं ठानी ।—रघुराज (शब्द॰) ।

२. (मन में) स्थिर करना । (मन में) ठहराना । निश्चित या ठीक करना । पक्का करना । चित्त में द्दढ़तापूर्वक धारण करना । द्दढ़ संकल्प करना । जैसे, मन में कोई बात ठानना, हठ ठानना । उ॰— (क) सदा राम एहि प्रान समाना । कारन कौन कुटिल पन ठाना ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) मैंने मन में कुछ ठान उनका हाथ पकड़ बोली ।—श्यामा॰, पृ॰ ९८ ।