ठार

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ठार ^३ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ ठारना] टालटूल । वि॰ दे॰ 'टाल' ।

ठार संज्ञा पुं॰ [सं॰ स्तब्ध, प्रा॰ ठड्ड, ठड या देश॰]

१. गहरा जाड़ा । अत्यंत शीत । गहरी सरदी ।

२. पाला । हिम । क्रि॰ प्र॰—पड़ना ।

ठार †पु [सं॰ स्थान, प्रा॰ ठाण; अप॰ ठाम, ठाव, ठाय]

१. स्थान । ठौर । जगह । उ॰—(क) राति दिवस करि चालीयउ, पुनरमइ दिवस पहुँतो तिणि ठार । बी॰ रासो, पृ॰ १०४ । (ख) आओ, तूँ सालिक राह दिवाने चलते न लाए बार । मुकाम राहे मंजिल बूझैं उलजा हे किस ठार ।— दक्खिनी॰, पृ॰ ५४ ।

२. खेत या खलिहान का वह स्थान जहाँ किसान अपने सामान आदि रखता है और देखरेख करता है ।

ठार † वि॰ [हिं॰] [वि॰ स्त्री॰ ठारि]दे॰ 'ठाढ़', 'ठाढ़ा' । उ॰— (क) तन दाहत कर घींचहिं तूरत, ठार रहत है सोई । आसन मारि बिबौरी होवै, तबहूँ भक्ति न होई ।—जग॰ श॰, भा॰ २, पृ॰ ३३ । (ख) ठारि भेलिहि धनि आँगो न डोले ।— विद्यापति, पृ॰ ४९ ।