ठीहा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ठीहा संज्ञा पुं॰ [सं॰ स्था]

१. जमीन में गड़ा हुआ लकड़ी का कुंदा जिसका थोड़ा सा भाग जमीन के ऊपर रहता है । विशेष—इस कुंदे पर वस्तुओं को रखकर लोहार, बढ़ई आदि उन्हें पीटते, छीलते या गढ़ते हैं । लोहार, कसेरे आदि धातु का काम करनेवाले इसी ठीहे में अपनी 'निहाई' गाड़ते हैं । पशुओं को खिलाने का चारा भी ठीहे पर रखकर काटा जाता है ।

२. बढ़इयों का लकड़ी गढ़ने का कुंदा जिसमें एक मोटी लकड़ी में ढालुआँ गड्ढा बना रहता है ।

३. बढ़इयों का लकड़ी चीरने का कुंदा जिसमें लकड़ी को कसकर खड़ा कर देते और चीरते हैं ।

४. बैठेने के लिये कुछ किया हुआ स्थान । बेदी । गद्दी ।

५. दूकानदार के बैठने की जगह ।

६. हद । सीमा ।

७. चाँड़ । थूनी ।

८. उपयुक्त स्थान ।