तगर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तगर ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. एक प्रकार का पेड़ जो अफगानिस्तान, कश्मीर, भूटान और कोंकण देश में नदियों के किनारे पाया जाता है । विशेष—भारत के बाहर यह मडागास्कर और जंजीबार में भी होता है । इसकी लकड़ी बहुत सुगंधित होती है और उसमें से बहुत अधिक मात्रा में एक प्रकार का तेल निकलता है । यह अकड़ी अगर की लकड़ी के स्थान पर तथा औषध के काम में आती है । लकड़ी काले रंग की और सुगंधित होती है और उसका बुरादा जलाने के काम में आता है । भावप्रकाश के अनुसार तगर दो प्रकार का होता है, एक में सफेद रंग के और दूसरे में नीले रंग के फूल लगते हैं । इसकी पत्तियों के रस से आँख के अनेक रोग दूर होते हैं । वैद्यक में इसे उष्ण, वीर्यवर्धक, शीतल, मधुर, स्निग्ध, लघु और विष, अपस्मार, शूल, दृष्टिदोष, विषदोप, भूतोन्माद और त्रिदोष आदि का नाशक माना है । पर्या॰—वक्र । कुटिल । शठ । महोरग । नत । दीपन । विनम्र । कुंचित । घंट । नहुष । पार्थिव । राजहर्षण । क्षत्र । दीन । कालानुशारिवा । कालानुसारक ।

२. इस वृक्ष की जड़ जिसकी गिनती गंध द्रव्यों में होती है । इसके चबाने से दाँतों का दर्द अच्छा हो जाता है ।

३. मदनवृक्ष । मैनफल ।

तगर ^२ संज्ञा पुं॰ [देश॰] एक प्रकार की शहद की मक्खी ।