तान

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तान संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. तालने का भाव या क्रिया । खींच । फैलाव । विस्तार । जैसे, भौंऔं की तान । उ॰— जल मैं मिलि कै नभ अवनी लौं तान तनावति ।— भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ ३, पृ॰ ४५५ । यौ॰— खींचतान ।

२. गानै का एक अंग । अनुलोभ विलोम गति से गमन । मुर्च्छना आदि द्वारा राग या स्वर का विस्तार । अनेक विभाग करके सूर का खींचना । लय का विस्ता । आलाप । उ॰— छूटे तान चँदेवा दीन्हा । टाढे़ भ्रगत गावन लीन्हा ।— कबीर मं॰, पृ॰ ४९९ । विशेष— संगीत दामोदर के मत से स्वरों से उत्पन्न ताम ४९ है । इन ४९ तानों से भी ८३०० कूट तान निकले हैं । किसी किसी मत से कूट तानों की संख्या ५०४० भी मानी गई है । मुहा॰— तान उड़ाना= गीत गाना । अलापना । तान तोड़ना = लय को खींचकर झटके के साथ समय पर विराम देना ।