तापना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तापना ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] पवित्रता । शुद्धता [को॰] ।

तापना ^२ क्रि॰ अ॰ [सं॰ तापन] आग की आँच से अपने को गरम करना । अपने को आग के सामने गरमाना । कहीं कहीं धूप लेने के खर्थ में भी बोलते हैं, जैसे, वह ताप रहा है । विशेष—'आग तापना' आदि प्रयोगों को देख अधिकांश लोगों ने इस क्रिया को सकर्मक माना है । पर आग इस क्रिया का कर्म नहीं है, क्यौं कि आग नहीं गरम की जाती है, गरम किया जाता है शरीर । 'खरीर तापते हैं', 'हाथ पैर तापते हैं' ऐसा नीहं बोला जाता । दूसरी बात ध्यान देने की यह है कि इस क्रिया का फल कर्ता से अन्यत्र कहीं नहीं देखा जाता, जैसे कि 'तपाना' में देखा जाता है । 'आग तापना' एक संयुक्त क्रिया है जिसमें आग तृतीयांत पद (करण) है ।

तापना ^३ क्रि॰ स॰

१. शरीर गरम करने के लिये जलाना । फूँकना । संयो॰ क्रि॰—डालना ।

२. उड़ाना । नष्ट करना । बरबाद करना । जैसे, — वे सारा धन फूँक तापकर किनारे हो गए । यौ॰—फूँकना तापना ।

तापना पु ^४ क्रि॰ स॰ तपाना । गरम करना । उ॰— तापी सब भूमि यों कृपान भासमान सों ।— भूषण ग्रं॰, पृ॰ ४९ ।