ताश

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ताश संज्ञा पुं॰ [अ॰ तास (= तश्त या चौड़ा बरतन)]

१. एक प्रकार का जरदोजी कपड़ा जिसका ताना रेशम का और बाना बादले का होता होता है । जरवफ्त ।

२. खेलने के लिये मोटे कागज का चौखूँटा टुकड़ा जिसपर रंगों की बूटियाँ या तसवीरें बनी रहती हैं । खेलने का पत्ता । विशेष—खेलने के ताश में चार रंग होते हैं—हुक्म, चिड़ी, पान और ईँट । एक एक रंग के तेरह तेरह पत्ते होते हैं । एक से दस तक तो बूटियाँ होती हैं जिन्हें क्रमशः एक्का, दुक्की (या दुड़ी), तिक्की, चौकी, पंजी, छक्का, सत्ता, अट्ठा नहला और दहला कहते हैं । इनके अतिरिक्त तीन पत्तों में क्रमशः गुलाम, बीब और बादशाह की तसवीरें होती हैं । इस प्रकार प्रत्येक रंग के तेरह पत्ते और सब मिलाकर बावन पत्ते होते हैं । खेलने के समय खेलनेवालों में ये पत्तें उलटकर बराबर बाँट दिए जाते हैं । साधारण खेल (रंगमार) में किसी रंग की अधिक बूटियोंवाला पत्ता उसी रंग की कम बूटियोंवाले पत्ते को मार सकता है । इसी प्रकार दहले को गुलाम मार सकता है और गुलाम को बीबी, बीबी को बादशाह और बादशाह को एक्का । एक्का सब पत्तों को मार सकता है । ताश के खेल कई प्रकार के होते हैं जैसे, ट्रंप, गन, गुलामचोर इत्यादि । ताश का खेल पहले किस देश में निकला, इसका ठीक पता नहीं है । कोई मिस्र देश को, कोई काबुल को, कोई अरब को और कोई भारतवर्ष को इसका आदि स्थाम बतलाता है । फारस और अरब में गंजीफे का खेल बहुत दिनों से प्रचलित है जिसके पत्ते रुपए के आकार के गोल गोल होते है । इसी से उन्हें ताश कहते हैं । अकबर के समय हिंदुस्तान में जो ताश प्रचलित थे, उनके रंगो के नाम और थे । जैसे, अश्वपति गजपति, नरपति, गढ़पति, दलपति इत्यादि । इनमें घोड़े, हाथी आदि पर सवार तसवीरें बनी होती थीं । पर आजकल जो ताश खेले जाते हैं वे यूरप से ही आते हैं ।