तिरछा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तिरछा वि॰ [सं॰ तिर्यक् या तिरस्] [स्त्री॰ तिरछी]

१. जो अपने आधार पर समकोण बनाता हुआ न गया हो । जो न बिलकुल खड़ा हो और न बिलकुल आड़ा हो । जो न ठीक ऊपर की ओर गाय हो और न ठीक बगल की ओर । जो ठीक सामने की ओर न जाकर इधर उधर हटकर गया हो । जैसे, तिरछी लकीर । विशेष— 'टेढ़ा' और 'तिरछा' में अंतर है । टेढ़ा वह है जो अपने लक्ष्य पर सीधा न गया हो, इधर उधर मुड़ता या घूमता हुआ गया हो । पर तिरछा वह है जो सीधा तो गया हो, पर जिसका लक्ष्य ठीक सामने, ठीक ऊपर या ठीक बगल में न हो । (टेढ़ी रेखा ~; तिरछी रेखा /) । यौ॰— बाँका तिरछा = छवीला । जैसे, बाँका तिरछा जवान । मुहा॰—तिरछी टोपी = बगल में कुछै झुकाकर सिर पर रखी टोपी । तिरछी चितवन = बिना सिर फेरे हुए बगल की ओर दृष्टि । विशेष— जब लोगों की दृष्टि बचाकर किसी ओर ताकना होता है, तब लोग, विशेषतः प्रेमी लोग, इस प्रकार की दृष्टि से देखते हैं । तिछी नजर = दे॰ 'तिरछी चितवन' । उ॰— हुए एक आन में जख्मी हजारों । जिधर उस यार ने तिरछी नजर की ।— कविता कौ॰, भा॰ ४, पृ॰ २९ । तिरछी बात या तिरछा वचन = कटु वाक्य । अप्रिय शब्द । उ॰— हरि उदास सुनि तिरीछे ।— सबल (शब्द॰) ।

२. एक प्रकार का रेशमी कपड़ा जो प्रायः अस्तर के काम में आता है ।