तिल

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तिल संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. प्रति वर्ष बोया जानेवाला हाथ डेढ़ हाथ ऊँचा एक पौधा जिसकी खेती संसार के प्रायः सभी गरम देशों में तेल के लिये होती है । विशेष— इसकी पत्तियाँ आठ दस अंगुल तक लंबी और तीन चार अंगुल चौड़ी होती हैं । ये नीचे की ओर तो ठीक आमने सामने मिली हुई लगती हैं, पर थोड़ा ऊपर चलकर कुछ अंतर पर होती हैं । पत्तियों के किनारे सीधे नहीं होते, टेढे़ मेढे़ होते हैं । फूल गिलास के आकार के ऊपर चार दलों में विभक्त होते हैं । ये फूल सफेद रंग के होते है, केवल मुँह पर भीतर की ओर बैंगनी धब्बे दिखाई देते हैं । बीजकोश लंबोतरे होते हैं जिनमें तिल के बीज भरे रहते हैं । ये बीज चिपटे और लंबोतरे होते हैं । हिंदुस्तान में तिल दो प्रकार का होता है— सफेद और काला । तिल की दो फसलें होती हैं— कुवारी और चैती । कुवारी फसल बरसात में ज्वार, बाजरे, धान आदि के साथ अधिकतर बोंई जाती हैं । चैती फसल यदि कार्तिक में बोई जाय तो पुस माघ तक तैयार हो जाती है । उदभिद शास्त्रवेत्ताओं का अनुमान है कि तिल का आदिस्थान अफ्रिका महाद्वीप है । वहाँ आठ नौ जाति के जंगली तिल पाए जाते हैं । पर तिल शब्द का व्यवहार संस्कृत में प्राचीन है, यहाँ तक कि जब और किसी बीज से तेल नहीं निकाला गया था, तव तिल से निकाला गया । इसी कारण उसका नाम ही तैल (तिल से निकला हुआ) पड़ गया । अथर्ववेद तक में तिल और धान द्वारा तर्पण का उल्लेख है । आजकल भी पितरों के तर्पण में तिल का व्यवहार होता है । वैद्यक में तिल भारी, स्निग्ध, गरम, कफ-पित्त-कारक, बलवर्धक, केशों को हितकारी, स्तनों में दूध उत्पन्न करनेवाला, मलरोधक और वातनाशक माना जाता है । तिल का तेल यदि कुछ अधिक पिया जाय, तो रेचक होता है । पर्या— हिमधान्य । पवित्र । पितृतर्पण । पापघ्न । पूतधान्य । जटिल । बनोद्भव । स्नेहफल । तैलफल ।

२. [सं] गाल पर काला बिंदु