तीर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तीर ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. नदी का किनारा । कूल । तट । उ॰— बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ।—मानस, १ । ४० ।

२. पास । समीप । निकट । विशेष—इस अर्थ में इसका उपयोग विभक्ति का लोप करके क्रियाविशेषण की तरह होता है ।

३. सीसा नामक धातु ।

४. राँगा ।

५. गंगा का तट (को॰) ।

६. एक प्रकार का बाण (को॰) ।

तीर ^२ संज्ञा पुं॰ [फा़॰] बाण । शर । उ॰—तीराँ उपर तीर सहि, सेलाँ उपर सेज ।—हम्मीर॰, पृ॰ ४८ । विशेष—यद्यपि पंचदशी आदि कुछ आधुनिक ग्रंथों में तीर शब्द बाण के अर्थ में आया है, तथापि यह शब्द वास्तव में है फारसी का । क्रि॰ प्र॰—चलाना ।—छोड़ना ।—फेंकना ।—लगना । मुहा॰—तीर चलाना = युक्ति भिड़ाना । रंग ढंग लगाना । जैसे,—तीर तो गहरा चलाया था, पर खाली गया । तीर फेकना = दे॰ = 'तीर चलाना' । लगे तो तीर नहीं तो तुक्का= कार्यसिद्धि पर ही साधन की उपयोगिता है ।

तीर ^३ संज्ञा पुं॰ [?] जहाज का मस्तूल ।

तीर ^४ वि॰ [हिं॰ तिरना (=पार करना)] पारंगत । जानकर । उ॰—बादशाह करे जिकीर सच्च हिंदु फकीर । ब्रह्मज्ञान में तीर रणधीर आए हैं ।—दक्खिनी॰, पृ॰ ५० ।