तुरीय

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तुरीय वि॰ [सं॰] चतुर्थ । चौथा । विशेष— वेद में वाणी या वाक् के चार भेद किए गए हैं— परा, पश्यंती, मध्यमा और बैखरी । इसी बैखरी वाणी को तुरीय भी कहते हैं । सायण के अनुसार जो नादात्मक वाणी मूलाधार से उठती है और जिसका निरूपण नहीं हो सकता है, उसका नाम परा है । जिसे केवल योगी लोग ही जान सकते हैं, वह पश्यंती है । फिर जब वाणी बृद्धिगत होकर बोलने की इच्छा उत्पन्न करती है, तब उसे मध्यमा कहते हैं । अंत में जब वाणी मुँह में आकर उच्चरित होती है, तब उसे बैखरी या तुरीय कहते है । वेदांतियों ने प्राणियों की चार अवस्थाएँ मानी हैं—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय । यह चौथी या तुरीयावस्था मोक्ष है जिसमें समस्त भेदज्ञान का नाश हो जाता है ओर आत्मा अनुपहित चैतन्य या ब्रह्मचैतन्य होती है ।