तुष्टि

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तुष्टि संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. संतोष । तुप्ति ।

२. प्रसन्नता । विशेष—सांख्य में नौ प्रकार की तुष्टियाँ मानी गई हैं, चार आध्यात्मिक और पाँच वाह्य । आध्यात्मिक तुष्टियाँ ये हैं ।— (१) प्रकृति—आत्मा को प्रकृति से भिन्न मानकर सब कार्यो का प्रकृति द्बारा होना मानने से जो तुष्टि होती है, उसे प्रकृति या अंगतुष्टि कहते हैं । (२) उपादान—सैन्यास से विवेक होता है, ऐसा समझ संन्यास से जो तुष्टि होती है, उसे उपादान या सलिलतुष्टि कहते हैं । (३) काल—काल पाकर आप ही विवेक या मोक्ष प्राप्त हो जायगा, इस प्रकार तुष्टि को कालतुष्टि या ओद्यतुष्टि कहते है । (४) भाग्य—भाग्य में होगा तो मोक्ष हो जायगा, ऐसी तृष्टि को भाग्यतुष्टि या वृष्टितुष्टि कहते हैं । इसी प्रकार इंद्रियों के बिषयों से विरक्ति द्बारा जो तुष्टि होती है, वह पाँच प्रकार से होती है; जैसे, यह समझने से कि, (१) अर्जन करने में बहुत कष्ट होता है, (२) रक्षा करना और कठिन है (३) विषयों का नाशा हो ही जाता है, (४) ज्यों ज्य़ों भोग करते है, त्यों त्यों इच्छा बढ़ती ही जाती हैं और (५) बिना दूसरे को कष्ट दिए सुख नहीं मिल सकता । इन पाँचों के नाम क्रमशः पार, सुपार, पारापोर, अनुत्तमांभ और उत्तमांभ हैं । इन नौ प्रकार की तुष्टियों के विपर्यय से बुद्धि की अशक्ति उत्पन्न होती है । वि॰ दे॰ 'अशक्ति' ।

३. कंस के आठ भाइयों में से एक ।