तेल

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

अनुवाद[सम्पादन]

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तेल संज्ञा पुं॰ [सं॰ तैल]

१. वह चिकना तरल पदार्थ जो बीजों वनस्पतियों आदि से किसी विशेष क्रिया द्बारा निकाला जाता है अथवा आपसे आप निकलता है । यह सदा पानी से हलका होता है, उसमें घुल नहीं सकता, अलकोहल में घुल जाता है । अधिक सरदी पाकर प्रायः जम जाता है और अग्नि के संयोग से धूआँ देकर जल जाता है । इसमें कुछ न गंध भी होती है । चिकना । रोगन । विशेष—तेल तीन प्रकार का होता है—मसृण, उड़ जानेवाला और खनिज । मसृण तेल वनस्पति और जंतु दोनों से निकलता है । वानस्पत्य मसृण वह है जो बाजों या दानों आदि को कोल्हू में पेरकर या दबाकर निकाला जाता है, जैसे, तिल, सरसों, नीम, गरी, रेंड़ी, कुसुम आदि का तेल । इस प्रकार का तेल दीआ जलाने, साबुन और वार्निश बनाने, सुगंधित करके सिर या शरीर में लगाने, खाने की चीजें तलने, फलों आदि का आचार डालने और इसी प्रकार के और दूसरे कामों में आता है । मशीनों के पुरजों में उन्हे घिसने से बचाने के लिये भी यह डाला जाता है । सिर में लगाने के चमेली, बेले आदि के जो सुगंधित तेल होते हैं वे बहुधा तिल के तेल की जमीन देकर ही बनाए जाते हैं । भिन्न भिन्न तेलों के गुण आदि भी एक दूसरे से भिन्न होते हैं । इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के वृक्षों से भी आपसे आप तेल निकलता है । जो पीछे से साफ कर लिया जाता है, जैसे—ताड़पीन आदिं । जंतुज तेल जानवरों की चरबी का तरल अंश है और इसका व्यवहार प्रायः औषध के रूप में ही होता है । जैसे, साँप का तेल, धनेस का तेल, मगर का तेल आदि । उड़ जानेवाला तेल वह है जो वनस्पति के भिन्न भिन्न अंशों से भभके द्बारा उतारा जाता है । जैसे, अजवायन का तेल, ताड़पीन का तेल, मोम का तेल, हींग का तेल आदि । ऐसे तैल हवा लगने से सूख या उड़ जाते हैं और इन्हैं खैलाने के लिये बहुत अधिक गरमी की आवश्यकता होती है । इस प्रकार के तेल के शरीर में लगने से कभी कभी कुछ जलन भी होती है । ऐसे तेलों का व्यवहार विलायती औषधों और सुगंधों आदि में बहुत आधि— कता से होता है । कभी कभी वारनिश या रंग आदि बनाने में भी यह काम आता है । खनिज तेल वह है जो केवल खानों या जमीन में खोदे हुए बड़े बड़े गड़्ढों में से ही निकलता है । जैसे, मिट्टी का तेल (देखो 'मिट्टी का तेल' और 'पेट्रोलियम') आदि । आजकल सारे सँसार में बहुधा रोशनी करने और मोटर (इंजिन) चलाने में इसी का व्यवहार होता है । आयुर्वेद में सब प्रकार के तेलों को वायुनाशक माना है । वैद्यक के अनुसार शरीर में तेल मलने से कफ और वायु का नाश होता है, धातु पुष्ट होती है, तेज बढ़ता है, चमड़ा मुलायम रहता है, रंग खिलता है और चित्त प्रसन्न रहता है । पैर के तलवों में तेल मलने से अच्छी तरह नींद आती है और मस्तिष् क तथा नेत्र ठंढे रहते हैं । सिर में तेल लगाने से सिर का दर्द दूर होता है, मास्तिष्क ठंढा रहता है, और बाल काले तथा घने रहते हैं । इन सब कामों के लिये बैद्यक में सरसों य़ा तिल के तेल को अधिक उत्तम और गुणाकारी बतलाया है । वैद्यक के अनुसार तेल में तली हुई खाने की चीजें विदाही, गुरुपाक, गरम, पित्तकर, त्वचादोष उत्पन्न करनेवाली और वायु तथा द्दष्टि के लिये अहितकर मानी गई हैं । साधारण सरसों आदि के तेल में अनेक प्रकार के रोग दूर करने के लिये तरह तरह की ओषधियाँ पकाई जाती हैं । क्रि॰ प्र॰—जलना ।—जलाना ।—निकलना ।—निकालना ।—पेरना ।—मलना ।—लगाना । मुहा॰—तेल में हाथ डालना = (१) अपनी सत्यता प्रमाणित करने के लिये खौलते हुए तेल में हाथ डालना (प्राचीन काल में सत्यता प्रमाणित करने के लिये खोलते हुए तेल में हाथ ड़लवाने की प्रथा थी) । (२) विकट शापथ खाना । आँख का तेल निकालना = दे॰ 'आँख' के मुहावरे ।

२. विवाह की एक रस्म जो साधारणतः विवाह से दो दिन और कहीं कहीं चार पाँच दिन पहले होती है । इसमें वर के वधू का नाम लेकर और वधू को वर नाम लेकर हल्दी मिला हुआ तेल लगाया जाता है । इस रस्म के उपरांत प्रायः विवाह संबंध नहीं छूट सकता । उ॰—अभ्युदयिक करवाय श्राद्ध विधि सब विवाह के चारा । कुत्ति तेल मायन करवैहैं ब्याह विधान आपारा ।—रघुराज (शब्द॰) । मुहा॰—तेल उठाना या चढा़ना = तेल की रस्म पूरी होना । उ॰—तिरिया तेल हमीर हठ चढ़ै न दूजी बार ।—कोई कवि (शब्द॰) । तेल चढ़ाना = तेल की रस्म पूरी करना । उ॰—प्रथम हरहि बंदन करि मंगल गावहिं । करि कुलरीति कलस थपि तेल चढ़ावहिं ।—तुलसी (शब्द॰) ।

तेल चलाई संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ तेल + चलाना] देशी छींट की छपाई में मिंडाई नाम की क्रिया । वि॰ दे 'मिंड़ाई' ।