तैत्तिरीय

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तैत्तिरीय संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. कृष्ण यजुर्वेद की छियासी शाखाओं में से एक । विशेष—यह आत्रेय अनुक्रमणिका और पाणिनि के अनुसार तित्तिरि नामक ऋषि प्रोक्त है । पुराणों में इसके संबंध में लिखा है कि एक बार वैशंपायन ने ब्रह्महत्या की थी । उसके प्रयाश्चित के लिये उन्होंने अपने शिष्यों को यज्ञ करने की आज्ञा दी । और सब शिष्य तो यज्ञ करने के लिये तैयार हो गए, पर याज्ञवल्क्य तैयार न हुए । इसपर वैशंपायन ने उनसे कहा कि तुम हमारी शिष्यता छोड़ दो । याज्ञवल्क्य ने जो कुछ उनसे पढा़ था वह सब उगल दिया; और उस वमन को उनके दूसरे सहपाठियों ने तीतर बनकर चुग लिया ।

२. इस शाखा का उपनिषद् । विशेष—यह तीन भागों में विभक्त है । पहला भाग संहितोष— निषद या शिक्षावल्ली कहलाता है; इसमें व्याकरण और अद्वैतवाद संबंधी बातें हैं । दूसरा भाग आनंदवल्ली और तीसरा भाग भृगुवल्ली कहलाता है । इन दोनों संमिलित भागों को वारुणी उपनिषद भी कहते हैं । तैत्तिरीय उपनिषद् में बह्मविद्या पर उत्तम विचारों के अतिरिक्त श्रुति, स्मृति और इतिहास संबंधी भी बहुत सी बातें हैं । इस उपनीषद् पर शंकराचार्य का बहुत अच्छा भाष्य है ।