तो

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

तो वेतन संबंधी और दूसरा दान संबंधी:पराशर ने लिखा है कि श्रमी या भृत्य को उसके काम के बदले वेतन न देना या वेतन देकर लौटा लेने का काम 'वेतनस्यानपाकर्म' है । इसी प्रकार दिए हुए माल को लौटाना और ग्रहण किए हुए माल को देना 'दत्तस्यानपाकर्म' है ।

तो पु ^१ सर्व॰ [सं॰ तव] तेरा ।

तो पु ^२ अव्य॰ [सं॰ तद्] तब । उस दशा में । जैसे,—(क) यदि तुम कहो तो मैं भी पत्र लिख दूँ । (ख) अगर वे मिलें तो उनसे भी कह देना । उ॰—जो प्रभु अवसि पार गा चहहू । तो पद पदुम पखारन कहहू ।—तुलसी (शब्द॰) । विशेष—पुरानी हिंदी में इस शब्द का, अर्थ में प्रयोग प्रायः 'जो' के साथ होता था ।

तो ^३ अव्य॰ [सं॰ तु] एक अव्यय जिसका व्यवहार किसी शब्द पर जोर देने के लिये अथवा कभी कभी यों किया जाता है । जैसे,—(क) आप चलें तो सही, मैं सब प्रबंध कर लूँगा । (ख) जरा बैठो तो । (ग) हम गए तो थे, पर वे ही नहीं मिले । (घ) देखो तो कैसी बहार है?

तो ^४ सर्व॰ [सं॰ तव] तुझ । तू का वह रूप जो उसे विभक्ति लगने के समय प्राप्त होता है, जैसे, तोको ।

तो ^५ क्रि॰ अ॰ [हिं॰ हतो ( = था) था । (क्व॰) । उ॰—काल करम दिगपाल सकल जग जाल जासु करतल तो ।—तुलसी (शब्द॰) ।