थरि

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

थरि संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ स्थली]

१. बाघ आदि की माँद । चुर । उ॰— सिंह थरि जाने बिन जावली जंगली भठी, हटी गज एदिल पठाय करि भटक्यो ।—भूषण ग्रं॰, पृ॰ १२ ।

२. स्थली । आवास स्थान । रहने की जगह । उ॰— जो लगि फेरि मुकुति हे परौ न पिंजर माहँ । जाउँ वेगि थरि आपनि है जहाँ बिंझ वनाँह ।—पदामावत, पृ॰, ३७३ ।