थाईभाव
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संज्ञा
[सम्पादित करें]थाईभाव (पुल्लिंग) 1. स्थायी भाव का ही एक रूप; नाट्यशास्त्र और रस सिद्धांत में वह भाव जो किसी रस की आधारशिला होता है।
- — यह वह स्थिर और गहन मानसिक अवस्था होती है जो अन्य विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से रस उत्पन्न करती है।
व्युत्पत्ति
[सम्पादित करें]संस्कृत शब्द **स्थायी भाव** से विकसित रूप **थाईभाव** (लोक प्रयोग में परिवर्तित)।
उदाहरण
[सम्पादित करें]- प्रेम, करुणा, क्रोध, हास्य आदि सभी थाईभाव माने गए हैं।
- कविता में वीर रस का थाईभाव उत्साह होता है।
उद्धरण
[सम्पादित करें]- "रति हाँसी अरु सोक पुनि क्रोध उछाहं सुजान ।
भय निंदा बिस्मय सदा, थाईभाव प्रमान ।" — *केशव ग्रंथावली*, भाग 1, पृ. 31
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]थाईभाव संज्ञा पुं॰ [सं॰ स्थायी भाव] दे॰ 'स्थायी भाव' । उ॰— रति हाँसी अरु सोक पुनि क्रोध उछाहं सुजान । भय निंदा बिस्मय सदा, थाईभाव प्रमान ।—केशव ग्रं॰, भा॰ १, पृ॰ ३१ ।
प्रकाशितकोशों से अर्थ
[सम्पादित करें]शब्दसागर
[सम्पादित करें]थाईभाव — संज्ञा (पुल्लिंग)
- — [संस्कृत: स्थायी भाव]
- — देखिए — 'स्थायी भाव'।