दाल

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

दाल ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ दालि अथवा दल]

१. दलों में किया हुआ अरहर, मूँग, उरद, चना, मसूर आदि अन्न जो उबालकर खाया जाता है । दली हुई अरहर, मूँग आदि जो सालन की तरह खाई जाती है । जैसे,— मूँग की दाल क्या भाव है? क्रि॰ प्र॰—दलना । यौ॰—दालमोठ । विशेष— दाल टन्हीं अनाजों की होती है जिनमें फलियाँ लगती हैं जौर जिनके बीज दबाने से टूटकर दो दलों या खंडो में हो जाते हैं । जैसे, अरहर, मूँग, उरद, चना, मसूर, मटर ।

२. हलदी, मसाले के साथ पानी में उबाला हुआ दला अन्न जो रोटी, भात आदि के साथ खाया जाता है । मुहा॰— दाल गलना = दाल का अच्छी तरह पककर नरम हो जाना । दाल का सीझना । (किसी की) दाल गलना = (किसी का) प्रयोजन सिद्ध होना । मतलब निकलना । कार्य- सिद्धि के लिये किसी युक्ति का चलना । विशेष— हम मुहा॰ का प्रयोग निषेधात्मक वाक्य में ही अधिकतर होता है जैसे, वहाँ तुम्हारी दाल नहीं गलेगी, बड़े बड़े उस्ताद हैं ।

दाल चपाती =(१) दाल रोटी । (२) बच्चों को डराने का एक नाम । दालचप्पू होना = एक दूसरे से लिपटकर एक हो जाना । गुत्थमगुत्था होना । जैसे, दो पतंगों का दालचप्पू होना । दाल दलिया = सूखा रूखा भोजन । गरीबों का सा खाना । दाल भात में मूसर होना = दो के मध्य में अनावश्यक, अप्रिय और अनिच्छित रूप में दखल देना । उ॰— एकांत बिहार में यह दाल भात में मूसर कहाँ से आ गाई?— प्रेमघन॰, भा॰ २, पृ॰ ४३५ । दाल में कुछ काला होना = कुछ खटके या संदेह की बात होना । कुछ बुरा रहस्य होना । किसी बुरी बात का लक्षण दिखाई पड़ना । दाल में नोन = किसी प्रमुख वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का उतना ही मेल मिलाना जिससे स्वाद में वृद्धि हो जाय । मात्रानुकूल । ठीक अनुमान । उ॰— उतना ही, जितना दाल में नोन पड़ सकता है ।—प्रेमघन॰, भा॰ २, पृ॰ २८८ । दाल रोटी = सादा खाना । सामान्य भोजन । आहार । दाल रोटी चलना = खाना मिलना । जीविका निर्वाह होना । दाल रोटी से खुश = खाने पीने से सुखी । खाता पीता । जिसे न अधिक धन हो न खाने पीने का कष्ट हो । जूतियों दाल चँटना = खूब लड़ाई झगड़ा होना । गहरी अनबन होना । आपस में न पटना ।

३. दाल के आकार की कोई वस्तु ।

४. चेचक, फोडे़, फुंसी आदि के ऊपर का चमड़ा जो सूखकर छूट जाता है । खुरंड । पपड़ी । मुहा॰— दाल छूटना = खुरंड अलग होना । दाल बंधना = खुरंड पड़ना ।

५. सूर्यमुखी शीशे से होकर आया हुआ किरनों का समूह जो इकट्ठा होकर गोल दाल के आकार का हो जाता है और जिससे आग लग जाती है । मुहा॰— दाल बँधना = अक्स का इकट्ठा होकर पड़ना ।

६. अंडे की जरदी ।

दाल ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ देवदारु] तुन की जाति का एक पेड़ जो हिमालय पर शिमला तथा आगे पंजाब की ओर होता है । विशेष— इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है । इसकी धरनें और कड़ियाँ मकानों में लगती हैं, पुल और रेल की सड़कों पर बिछाई जाती हैं तथा और भी बहुत से कामों में आती हैं ।

दाल ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. एक प्रकार का मधु । पेड़ के खोंडरे में मिलनेवाला शहद ।

२. कोदो नाम का अन्न ।