धर्मशास्त्र

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

धर्मशास्त्र संज्ञा पुं॰ [सं॰] किसी जनसमूह के लिये उचित आचार व्यवहार की व्यवस्था जो किसी महात्मा या आचार्य की ओर से होने के कारण मान्य समझी जाती हो । वह ग्रंथ जिसमें समाज के शासान के निर्मित्त नीति और सदाचार संबंधी नियम हों । जैसे, मानव धर्मशास्त्र । विशेष— हिंदुओं के धर्मशास्त्र 'स्मृति' के नाम से प्रसिद्ध हैं । इन में मनुस्मृति सबसे प्रधान समझी जाती है । मनु के अतिरिक्त यम, वशिष्ठ, अत्रि, दक्ष, बिष्णु, अगिरा, उशना, बृहस्पति, व्यास, आपस्तंब, गौतम, कात्यायन, नारद, याज्ञवरुक्य, पराशर, संवर्त्त, शंख और हारीत भी स्मृतिकार हुए हैं । दे॰ 'स्मृति' ।