नक्षत्र

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

नक्षत्र संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. चंद्रमा के पथ में पड़नेवाले तारों का वह समूह या गुच्छ जिसका पहचान के लिये आकार निर्दिष्ट करके कोई नाम रखा गया हो । विशेष—इन तारों को ग्रहों से भिन्न समझना चाहिए जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं ओर हमारे इस सीर जगत् के अंतर्गत हैं । ये तारे हमारे सौर जगत् के भीतर नहीं है । ये सूर्य से बहुत दूर हैं और सुर्य की परिक्रमा न करने के कारण स्थिर जान पड़ते हैं—अर्थात् एक तारा दूसरे तारे से जिस और और जितनी दूर आज देखा जायगा उसी ओर और उतनी ही दूर पर सदा देखा जायगा । इस प्रकार ऐसे दो चार पास पास रहनेवाले तारों की परस्पर स्थिति का ध्यान एक बार कर लेने से हम उन सबको दूसरी बार देखने से पहचान सकते हैं । पहचान के लिये यदि हम उन सब तारों के मिलने से जो आकार बने उसे निर्दिष्ट करके समूचे तारकपुंज का कोई नाम रख लें तो और भी सुभीता होगा । नक्षत्रों का विभाग इसीलिये और इसी प्रकार किया गया है । चंद्रमा २७-२८ दिनों में पृथ्वी के चारों ओर घूम आता है । खगोल में यह भ्रमणपथ इन्हीं तारों के बीच से होकर गया हुआ जान पड़ता है । इसी पथ में पड़नेवाले तारों के अलग अलग दल बाँधकर एक एक तारकपुंज का नाम नक्षत्र रखा गया है । इस रीति से सारा पथ इन २७ नक्षत्रों में विभक्त होकर नक्षत्र चक्र कहलाता है । नीचे तारों की संख्या और आकृति सहित २७ नक्षत्रों के नाम दिए जाते हैं— नक्षत्र तारासंख्या आकृति और पहचान अश्विनी ३ घोड़ा । भरणी ३ त्रिकोण कृत्तिका ६ अग्निशिखा रोहिणी ५ गाड़ी मृगशिरा ३ हरिणमस्तक वा विडालपद आर्द्रा १ उज्वल पुनर्वसु ५ या ६ धनुष या धर पुष्य १ वा ३ माणिक्य वर्ण अश्लेषा ५ कुत्ते की पूँछ वा कुलावचक्र मघा ५ हल पूर्वाफाल्गुनी २ खट्वाकारX उत्तर दक्षिण उत्तराफाल्गुनी २ शय्याकारX उत्तर दक्षिण हस्त ५ हाथ का पंजा चित्रा १ मुक्तावत् उज्वल स्वाती १ कुंकुं वर्ण विशाखा ५ व ६ तोरण या माला अनुराधा ७ सूप या जलधारा ज्येष्ठा ३ सर्प या कुंडल मुल ९या ११ शंख या सिंह की पूँछ पुर्वाषाढा ४ सूप या हाथी का दाँत उत्तरषाढा ४ सूप श्रवण ३ बाण या त्रिशूल धनिष्ठा ५ मर्दल बाजा शतभिषा १०० मंडलाकार पूर्वभाद्रपद २ भारवत् या घंटाकार उत्तरभाद्रपद २ दो मस्तक रेवती ३२ मछली या मृदंग इन २७ नक्षत्रों के अतिरिक्त अभिजित् नाम का एक और नक्षत्र पहले माना जाता था पर वह पूर्वाषाढ़ा के भीतर ही आ जाता है, इससे अब २७ ही नक्षत्र गिने जाते हैं । इन्हीं नक्षत्रों के नाम पर महीनों के नाम रखे गए हैं । जिस महीने की पुर्णिमा चंद्रमा जिस नक्षत्र पर रहेगा उस महीने का नाम उसी नक्षत्र के अनुसार होगा, जैसे कार्तिक की पूर्णिमा को चंद्रमा कृत्तिका वा रोहिणी नक्षत्प पर रहेगा, अग्रहाय ण की पूर्णिमा को मृगशिरा वा आर्दा पर; इसी प्रकार और समझिए । जिस प्रकार चंद्रमा के पथ का विभाग किया गया है उसी प्रकार उस पथ का विभाग भी हुआ है जिसे सूर्य १२ महीनों में पूरा करता हुआ जान पड़ता है । इस पथ के १२ विभाग किए गए हैं जिन्हें राशि कहते हैं । जिन तारों के बीच से होकर चंद्रमा घूमता है उन्हीं पर से होकर सूर्य भी गमन करता हुआ जान पड़ता है; खचक्र एक ही है, विभाग में अंतर है । राशिचक्र के विभाग बड़े हैं जिनसें से किसी किसी के अंतर्गत तीन तीन नक्षत्र तक आ जाते हैं । कुछ विद्वानों का मत है कि यह राशि- विभाग पहले पहल मिस्त्रवालों ने किया जिसे यवन लोगों (यूनानियों) ने लेकर और और स्थानों में फैलाया । पश्चिमी ज्योतिषियों ने जब देखा कि बारह राशियों से सारे अंतरिक्ष के तारों और नक्षत्रों का निर्देश नहीं होता है तब उन्होंने और बहुत सी राशियों के नाम रखे । इस प्रकार राशियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती गई । पर भारतीय ज्योतिषियों ने खगोस के उत्तर और दक्षिण खंड में जो तारे हैं उन्हें नक्षत्रों में बाँधकर निर्दिष्ट नहीं किया । नक्षत्र या तारे ग्रहों की तरह छोटे छोटे पिंड नहीं हैं, वे बड़े बड़े सूर्य हैं जो हमारे इस सूर्य से बहुत दूरी पर हैं । इनकी संख्या अपरिमित है । वर्तमान काल के युरोपिय ज्योतिषियों ने बड़ी बड़ी दूरबीनों आदि की सहायता से खगोल का बहुत अनुसंधान किया है । उन्होंने तारों का वार्षिक लंबन (किसी नक्षत्र से एक रेखा सूर्य तक और दूसरी पृथ्वी तक खींचने से जो कोण बनाता है उसे उस नक्षत्र का लंबन कहते हैं) निका- लकर, उनकी दूरी निश्चित करने में बड़ा उद्योग किया है । यदि किसी नक्षत्र का यह कोण एक सेकंड है तो समझना चाहिए कि उसकी दूरी सूर्य की दूरी की अपेक्षा २०६०० गुनी अधिक है । कोई नक्षत्र कम दूरी पर हैं, कोई अधिक; जैसे स्वाती, धनिष्ठा और श्रवण नक्षत्र रविमार्ग से बहुत दूर है और रोहिणी, पुष्य और चित्रा उनकी अपेक्षा निकट हैं । जो तारे औरों की अपेक्षा निकट हैं उनके प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में तीन साढ़े तीन वर्ष लग जाते हैं, दूरवालों का प्रकाश तीन तीन चार चार सौ वर्ष में पहुँचता है । प्रकाश की गति एक सेकंड में १८६००० मील ठहराई गई है । इसी से इनकी दूरी का अंदाजा हो सकता है ।

२. तारा । तारक (को॰) ।

३. मोती (को॰) ।

४. वह हार जिसमें २७ मोती गुहे गए हों (को॰) ।