नक्षत्रवीथि

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

नक्षत्रवीथि संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] नक्षत्रों में गति के अनुसार तीन तीन नक्षत्रों के बीच का कल्पित मार्ग । विशेष—बृहत्संहिता के अनुसार तीन तीन नक्षत्रों में एक वीथि होती है । स्वाति, भरणी और कृतिका में नागवीथि होती है; रोहिणी, मृगशिरा और आर्द्रा में गजबीथि; पुनर्वसु, पुष्य और अश्लेषा में ऐरावत; मघा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफा- ल्गुनी में बृषभ; अश्विनी रेवती और पूर्वा एवं उत्तरा भाद्रापद में गोवीथि; श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा में जरद्गववीथि, अनुराध, ज्येष्ठा और मूल में मृगवीथि हस्त, विशाखा और चित्रा में अजावीथि, तथा पूर्वाषाढा औप उत्तरषाढा में दहना- वीथि । इस प्रकार २७ नक्षत्रों में ९ वीथियाँ होने पर प्रत्येक वीथि तीन बार होती है अतः इनमें तीन तीन वीथियाँ सूर्यमार्ग के उत्तर, मध्य और दक्षिण होती हैं । फिर इनमें से भी प्रत्येक यथाक्रम उत्तर, मध्य और दक्षिण होती हैं— जैसे, तीन नागवीथियाँ हैं, उनमें से प्रथम उत्तरमार्गस्था, दूसरी मध्यस्था और तीसरी दक्षिणामार्गस्था हुई । इन वीथियों का विचार फलित में होता है—जैसे शुक्र जिस समय उत्तर- वीथि में होकर उदित वा अस्त होता है उस समय सुभिक्ष और मँगल होता है, मध्यवीथि में होने से मध्यफल और दक्षिण वीथि में होने से मंदफल होता है ।