नील

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नील

हिन्दी[सम्पादन]

उच्चारण[सम्पादन]

(file)

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

नील ^१ वि॰ [सं॰] [वि॰ स्त्री॰ नीला, नीली] नीले रंग का । गहरे आसमानी रंग का ।

नील ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. नीला रंग । गहरा आसमानी रंग ।

२. एक पौधा जिससे नीला रंग निकाला जाता है । विशेष—यह दो तीन हाथ ऊँचा होता है । पत्तियाँ चमेली की तरह टहनी के दोनों ओर पंक्ति में लगती हैं पर छोटी छोटी होती हैं । फूल मंजरियों में लगते हैं । लंबी लंबी बबूल की तरह फलियाँ लगती हैं । नील के पौधे की ३०० के लगभग जातियाँ होती हैं । पर जिनसे यहाँ रंग निकाला जाता है वे पौधे भारतवर्ष कै हैं और अरब मिस्र तथा अमेरिकां में भी बोए जाते हैं । भारतवर्ष हो नील का आदिस्थान हे और यहीं सबसे पहले रंग निकाला जाता था । ८० ईसवी में सिंध के किनारे के एक नगर से नील का बाहर भेजा जाना एक प्राचीन यूनानी लेखक्र ने लिखा है । पीछे के बहुत से विदेशियों ने यहाँ नील के बोए जाने का उल्लेख किया है । ईसा की पद्रहवीं शताब्दी में जब यहाँ से नील योरप के देशों में जाने लगा तब से वहाँ के निवासियों का ध्यान नील की और गया । सबसे पहले हालैंडवालों ने नील का काम शुरू किया और कुछ दिनों तक वे नील की रंगाई के लिये योरप भर में निपुण समझे जाते थे । नील के कारण जब वहाँ कई वस्तुओं के वाणिज्य को धक्का पहुचने लगा तब फ्रांस, जर्मनी आदि कानून द्वारा नील की आमद बद करने पर विवश हुए । कुछ दिनो तक (सन् १६६० तक) इगलैंड में भी लोग नील को विष कहते रहे जिससे इसका वहाँ जाना बद रहा । पीछे बेलजियम से नील का रंग बनानेवाले बुलाए गए जिन्होंने नील का काम सिखाया । पहले पहल गुजरात और उसके आस पास के देशों में से नील योरप जाता था; बिहार, बंगाल आदि से नहीं । ईस्ट इंडिय कंपनी ने जब नील के काम की और ध्यान दिया तब बंगा ल बिहार में नील की बहुत सी कोठियाँ खुल गईं और नील की खेती में बहुत उन्नति हुई । भिन्न भिन्न स्थानों में नील की खेती भिन्न भिन्न ऋतुओं में और भिन्न भिन्न रीति से होती है । कहीं तो फसल तीन ही महीने तक खेत में रहते हैं और कहीं अठारह महीने तक । जहाँ पौधे बहुत दिनों तक खेत में रहते हैं वहाँ उनसे कई बार काटकर पत्तियाँ आदि ली जाती हैं । पर अब फसल को बहुत दिनों तक खेत में रखने की चाल उठती जाती है । बिहार में नील फागुन चैत के महीने में बोया जाता है । गरमी में तो फसल की बाढ़ रुकी रहती है पर पानी पड़ते ही जोर के साथ टहनियाँ और पत्तियाँ निकलती और बढ़ती है । अतः आषाढ़ में पहला कलम हो जाता है और टहनियाँ आदि कारखाने भेज दी जाती हैं । खेत में केवल खूँटियाँ ही रह जाती हैं । कलम के पीछे फिर खेत जोत दिया जाता है जिससे वह बरसात का पानी अच्छी तरह सोखता है और खूँटियाँ फिर बढ़कर पोधों के रूप में हो जाती हैं । दूसरी कटाई फिर कुवार में होती है । नील से रंग दो प्रकार से निकाल जाता है—हरे पौधे से और सूखे पोधे से । कटे हुए हरे पौधों को गड़ी हुई नाँदों में दबाकर रख देते हैं और ऊपर से पानी भर देते हैं । बारह चौदह घंटे पानी में पड़े रहने से उसका रस पानी में उतर आता है और पानी का रंग धानी हो जाता है । इसके पीछे पानी दूसरी नाँद में जाता है जहाँ डेढ़ दो घंटे तक लकड़ी से हिलाया और मथा जाता है । मथने का यह काम मशीन के चक्कर से भी होता है । मथने के पीछे पानी थिराने के लिये छोड़ दिया जाता है जिससे कुछ देर में माल नीचे बैठ जाता है । फिर नीचे बैठा हुआ यह नील साफ पानी में मिलाकर उबाला जाता है । उबल जाने पर यह बाँस की फट्टियों के सहारे तानकर फैलाए हुए मोटे कपड़े (या कनवस) की चाँदनी पर ढाल दिया जाता है । यह चाँदनी छनने का काम करती है । पानी तो निथर कर बह जाता है और साफ नील लेई के रूप में लगा रह जाता है । यह गीला नील छोटे छोटे छिद्रों से युक्त एक संदूक में, जिसमें गीला कपड़ा मढ़ा रहता हे, रखकर खूब दबाया जाता है जिससे उसके सात आठ अंगुल मोटी तह जमकर हो जाती है । इसकै कतरे काटकर घोरे धीरे सूखने के लिये रख दिए जाते हैं । सूखने पर इन कतरों पर एक पपड़ी सी जम जाती है जिसे साफ कर देते हैं । ये ही कतरे नील के नाम से बिकते हैं । मिताक्षरा, विधानपारिजात आदि धर्मशास्त्र के कई ग्रंथों में ब्राह्मण के लिये नील में रँगा हुआ वस्त्र पहनने का निषेध है । मुहा॰—नील का टीका लगाना = कलंक लेना । बदनामी उठाना । उ॰—नल में तो वल तो बिलास कहाँ बूझत हौ; नील से लरे ते टीको नील को न करिहैं ।—हनुमान (शब्द॰) । नील का खेत = कलंक का स्थान । नील की सलाई फिरवा देना = आँखे फोड़वा डालना । अंधा कर देना । (कहते हैं, पहले अपराधियों की आँख में नील की गरम सलाई डाल दी जाती थी जिससे वे अंधे हो जाते थे) । नील घोंटना = झगड़ा बखेड़ा मचाना । किसी बात को लेकर देर तक उलझना । नील जलाना = पानी बरसने के लिये नील जलाने का टोटका करना । नील बिगड़ना = (१) चाल चलन बिगड़ना । आचरण भ्रष्ट होना । (२) आकृति बिगड़ना । चेहरे का रंग उड़ना । (३) किसी बे सिर पैर की बात का प्रसिद्ध होना । झूठी और असंगत बात फैलना । (४) ससझ पर पत्थर पड़ना । बुद्धि ठिकाने न रहना । (५) कुदिन आना । शामत आना । दुर्दशा होनेवाली होना । (६) भारी हानि या घाटा होना । दिवाला होना ।

३. चोट का नीले या काले रंग का दाग जो शरीर पर पड़ जाता है । जैसे,—जहाँ जहाँ छड़ी बैठी है नील पड़ गया है । क्रि॰ प्र॰—पड़ना । मुहा॰—नील जालना = इतनी मार मारना कि शरीर पर नीले दाग पड़ जायँ । गहरी मार मारना ।

४. लांछन । कलंक ।

५. राम की सेना का एक बंदर ।

६. भागवत के अनुसार इलावृत्त खंड का एक पर्वत जो रम्यक वर्ष की सीमा पर है ।

७. नव निधियों में से एक ।

८. मंगल घोष । मंगल का शब्द ।

९. वटवृक्ष । बरगद ।

१०. इंद्रनील मणि । नीलम ।

११. काट लवण ।

१२. तालीसपत्र ।

१३. विष ।

१४. एक नाग का नाम ।

१५. विष्णुपुराण में वर्णित नीलनी से उत्पन्न अजमीड़ राजा का एक पुत्र ।

१६. माहिष्मती का एक राजा । विशेष—इसकी कथा महाभारत में इस प्रकार आई है । नील राजा की एक अत्यंत सुंदरी कन्या थी जिसपर मोहित होकर अग्नि देवता ब्राह्मण के वेश में राजा से कन्या माँगने आए । कन्या पाकर अग्नि देवता ने राजा को वर दिया कि जो शत्रु तुमपर चढ़ाई करेगा वह भस्म हो जायगा । पांडवों के राजसूय यज्ञ के अवसर पर सहदेव ने माहिष्मती नगरी को घेरा । अपनी सेना की भस्म होते देख सहदेव ने अग्नि देवता की स्तुति की । अग्निदेव ने प्रगट होकर कहा कि नील के वंश में जबतक कोई रहेगा मैं बराबर इसी प्रकार रक्षा करूँगा । अंत में अग्नि की आज्ञा से नील ने सहदेव की पूजा की और सहदेव उससे इस प्रकार अधीनता स्वीकार कराकर चले गए ।

१७. नृत्य के १०८ करणों में से एक ।

१८. एक यम का नाम ।

१९. एक वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में सोलह वर्ण होते है । यथा,—डंकनि देत अतंकनि संकनि दूरि धरैं । गोमुख दूरनि पूर चहूँ दिसि भीति भरैं ।

२०. एक प्रकार का विजय साल ।

२१. मंजुश्री का एक नाम ।

२२. गहरे नीले रंग का वृषभ (को॰) ।

२३. एक संख्या जो दस हजार अरब की होती है । सौ अरब की संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है— १००००००००००००० ।