पञ्चाल

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पंचाल संज्ञा पुं॰ [सं॰ पञ्चाल]

१. एक देश का प्राचीन नाम ज ो ब्राह्मण और उपनिषद् ग्रंथों से लेकर पुराणों तक में पाया जाता है । विशेष—इस देश की सीमा भिन्न भिन्न कालों में भिन्न भिन्न रही है । यह देश हिमालय और चंबल के बीच गंगा नदी के दोनों ओर माना जाता था । गंगा के उत्तर प्रदेश को उत्तर पंचाल और दक्षिण प्रदेश को दक्षिण पंचाल कहते थे । इस देश को देवपंचाल से भिन्न समभना चाहिए जो सौराष्ट्र देश का एक भाग था । इस देश का पंचाल नाम पड़ने के संबंध में पुराणों में यह कथा है : महाराज महाराज हर्यश्व अपने भाई से लड़कर अपनी ससुराल मधुपुरी चले गए और अपने ससुर मधु की सहायता से उन्होंने अयोध्या के पश्चिम के देशों पर अधिकार कर लिया । जब लोगों ने आकर उनसे अयोध्या के राजा के आक्रमण की बात कही तब उन्होंने पाँच पुत्रों (मुदराण, सृंजय, बृहदिषु, प्रवीर और कांपिल्य) की और देखकर कहा की ये पाँचो हमारे राज्य की रक्षा के लिये अलम् (पंचालम्) हैं । तभी से उनके अधिकृत देश का नाम पंचाल पड़ा । हरिवंश में लिखा है कि हर्यश्व ने सौराष्ट्रे देश में आनर्तपुर नामक नगर बसाया था । इसी अधार पर कुछ लोग देवपंचाल को ही पंचाल कहते हैं । पर महाभारत में हिमालय के अंचल से लेकर चंबल तक फैले हुए गंगा के उभयपार्श्वस्थ देश का ही वर्णन पंचाल के अंतर्गत आया है । पांडवों के समय में इस देश का राजा द्रुपद था जिससे द्रोणाचार्य ने उत्तरपंचाल छीन लिया था । महाभारत में उत्तरपंचाल की राजधानी अहिच्छत्रपुर और दक्षिण की कंपिल लिखी है । द्रोपदी यहीं के राजा की कन्या होने के कारण 'पांचाली' कही गई है ।

२. [स्त्री॰ पंचाली] पंचाल देशवासी ।

३. पंचाल देश का राजा ।

४. एक ऋषि जो वाभ्रव्य गोत्र के थे ।

५. महादेव । शिव ।

६. एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में एक तगण (/?/) होता है ।

७. दक्षिण देश की एक जाति । इस जाति के लोग बढ़ई और लोहार का काम करते हैं और अपने को विश्वकर्मा के वंश का बतलाते हैं । ये जनेऊ पहनते हैं ।

८. एक सर्प का नाम ।

९. एक विषैला कीड़ा ।