पड़ना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पड़ना क्रि॰ अ॰ [सं॰ पतन, प्रा॰ पड़न] एक स्थान से गिरकर, उछलकर अथवा और किसी प्रकार दूसरे स्थान पर पहुँचना या स्थित होना । कहीं से चलकर कहीं, प्राय: ऊँचे स्थान से नीचे आना । गिरना । पतित होना । जैसे,—जमीन पर पानी या ओला पड़ना, सिर पर पत्थर पड़ना, चिराग पर हाथ पड़ना, साँप पर निगाह पड़ना, कान में आवाज पड़ना, कुरते पर छींटा पड़ना, बिसात पर पासा पड़ना आदि । संयो॰ क्रि॰—जाना । विशेष—'गिरना' और पड़ना के अर्थो में यह अंतर है कि पहली क्रिया का विशेष लक्ष्य गति व्यापार पर और दूसरी का प्राप्ति या स्थिति पर होता है । अर्थात् पहली क्रिया वस्तु का किसी स्थान से चलना या रवाना होना और दूसरी क्रिया किसी स्थान पर पहुँचना या ठहरना सूचित करती है । जैसे— पहाड़ के पत्थर गिरना और सिर पर पत्थर पड़ना ।

२. (कोई दुःखद घटना) घटित होना । अनिष्ट या अवांछ- नीय वस्तु या अवस्था प्राप्त होना । जैसे, डाका पड़ना, अकाल पड़ना, मुसीबत पड़ना, ईश्वरीय कोप पड़ना, इत्यादि । मुहा॰—(किसी पर) पड़ना = विपत्ति या मुसीबत आना । संकट या कठिनाई प्राप्त होना । जैसे—(क) जैसी मुझ पर पड़ी इश्वर वैसी किसी पर न डाले । (ख) जिसपर पड़ती है वही जानता है ।

३. बिछाया जाना । फैलाया जाना । रखा जाना । डाला जाना । जैसे, दीवार पर छप्पर पड़ना, जनवासे में विस्तर या भोज में पत्तल पड़ना ।

४. छोड़ा या डाला जाना । पहुँचना या पहुँचाया जाना । दाखिल होना । प्रविष्ट होना । जैसे , पेट में रोटी पड़ना, दाल में नमक पड़ना, कान में शब्द या आँख में तिनका पड़ना, दूध में पानी पड़ना, किसी के घर में पड़ना (= ब्याही जाना), फेर में पड़ना, इत्यादि । संयो॰ क्रि॰—जाना ।

५. बीच में आना या जाना । हस्तक्षेप करना । दखल देना । जैसे,—तुम चाहे जो करो, हम तुम्हारे मामले में नहीं पड़ते ।

६. ठहरना । टिकना । विश्राम करने या रात बिताने के लिये अवस्थानं करना । डेरा डालना । पड़ाव करना (बरात या सेना के लिये बोलते हैं) । जैसे,—आज बरात कहाँ पड़ेगी ? मुहा॰—पड़ा होना = (१) एक स्थान में कुछ समय तक स्थित रहना । एक ही जगह पर बने रहना । जैसे,—(क) वे तिन रोज तक तो वहीं पड़े हुए थे, आज गए हैं । (ख) वह दस रुपए महीने पर बरसों से पड़ा है (२) एक ही अवस्था में रहना । रखा रहना । धरा रहना । अव्यबह्वत रहना । जैसे,—यह किताब तुम्हारे पास एक महीने से पड़ी है, पर शायद तुमने एक पन्ना भी न उलटा होगा । (३) बाकी रहना । शेष रहना । जैसे,—(क) सारी किताब पढ़ने को पड़ी है । (ख) अभी ऐसे सैकड़ों लोग पड़े होंगे जिनके कानों में यह शुभ संदेश नहीं पड़ा ।

७. विश्राम के लिये सोना या लेटना । कल लेना । आराम करना । जैसे,—थोड़ी देर पड़े रहो तो तबीअत हलकी हो जायगी । संयो॰ क्रि॰—जाना ।—रहना । मुहा॰—पड़े रहना या पड़ा रहना = बराबर लेटे रहना । बिना कुछ काम किए लेटे रहना । लेटकर बेकारी काटना । निकम्मा रहना । जैसे,—दिन भर पड़े रहते हो, क्या तुम्हारी तबीअत भी नहीं घबराति ?

८. बीमार होना । खाट पर पड़ना । जैसे,—(क) अबकी तुम किस बुरी साइत में पड़े कि अबतक न उठे । (ख) मैं तो आज चार रोज से पड़ा हूँ, तुमने कल बाजार में मुझे कैसे देखा ? संयो॰ क्रि॰—जाना ।—रहना ।

९. मिलना । प्राप्त होना । जैसे,—तुम यह किताब लोगे, तभी तुम्हें चैन पड़ेगा । संयो॰ क्रि॰—जाना ।

१०. पड़ता खाना । जैसे,—(क) चार आने में नहीं पड़ता, नहीं तो बेच न देता । (ख) हमें वह आलमारी १२) में पड़ी है । (ग) इकट्ठा सौदा सस्ता पड़ता है । सं॰ क्रि॰—जाना ।

११. आय, प्राप्ति आदि का औसत होना । पड़ता होना । जैसे—यहाँ मुझे एक रुपए रोज से अधिक नहीं पड़ता । सं॰ क्रि॰—जाना ।

१२. रास्ते में मिलना । मार्ग में मिलना । जैसे—(क) तुम्हारे रास्ते में चार नदियाँ और पाँच पड़ाव पड़ेंगे । (ख) घर से निकलते ही काना पड़ा, देखें कुशल से पहुँचते हैं या नहीं ।

१३. उत्पन्न होना । पैदा होना । जैसे,—बाल में दाने पड़ना । फल में कीड़े पड़ना ।

१४. स्थित होना । जैसे— (क) बगीचे में डेरा पड़ा है । (ख) इस कुंडली के सातवें घर में मंगल पड़ा है ।

१५. संयोगदश होना ।