पतझड़

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पतझड़ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ पत (पत्ता) + झड़ना]

१. वह ऋतु जिसमें पेड़ों की पत्तियाँ झड़ जाती हैं । शिशिर ऋतु । माघ और फाल्गुन के महीने । कुंभ और मीन की संक्रांतियाँ । विशेष—इस ऋतु में हवा अत्यंत रूखी और सर्राठे की हो जाती है, जिससे वस्तुओं के रस और स्निग्धता का शोषण होता है और वे अत्यंत रूखी हो जाती हैं । वृक्षों की पत्तियाँ रूक्षता के कारण सूखकर झड़ जाती हैं और वे ठूँठे हो जाते हैं । सृष्टि का सौंदर्य और शोभा इस ऋतु में बहुत घट जाती हैं, वह वैभवहीन हो जाती है । इस से कवीयों को यह अप्रिय है । वैद्यक के मतानुसार इस ऋतु में कफ का संचय होता है और पाचकाग्नि प्रबल रहती है जिससे स्निग्ध और आहार इसमें सरलता से पचता है और पथ्य है । हलके, वातवर्धक और तरल भोजनद्रव्य इसमें अपथ्य हैं । सुश्रुत के मत से माघ और फाल्गुन ही पतझड़ के महीने हैं, पर अन्य अनेक वैद्यक ग्रंथों ने पूस और माघ को पतझड़ माना है । वैद्यक के अतिरिक्त सर्वत्र माघ और फाल्गुन ही पतझड़ माने गए हैं ।

२. अवनतिकाल । खराबी और तबाही का समय । वैभवहीनता या कंगाली का समय ।