पदार्थ

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search


हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पदार्थ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. पद का अर्थ । शब्द का विषय । वह जिसका कोई नाम हो और जिसका ज्ञान प्राप्त किया जा सके ।

२. उन विषयों में कोई विषय जिनका किसी दर्शन में प्राति- पादन हो और जिनके संबंध में यह माना जाता हो कि उनके द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती है । विशेष—वैशेषिक दर्शन के अनुसार द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष ओर समवाय ये छह पदार्थ, हैं ओर इन्ही छह पदार्थों का उसमें निरूपण है । कुल चीजें इन्हीं छह पदार्थों के अंतर्गत मानी गई हैं । ये छह 'भाव' पदार्थ हैं और 'भाव' की विद्यमानता में 'अभाव' का होना भी स्वाभाविक है । अतः नवीन वैशेषिकों ने इन सब पदार्थों के विपरीत एक नया और सातवाँ पदार्थ 'अभाव' भी मान लिया है । इसके अतिरिक्त कुछ और लोगों ने 'तम' अथवा अंधकार को भी एक पदार्थ माना है । परंतु अंधकार वास्तव में प्रकाश का अभाव ही होता है, इसलिये स्वयं अंधकार कोई स्वतंत्र पदार्थ नहीं हो सकता । विशेष—दे॰ 'वेशेषिक' । गौतम के न्यायसूत्र में सोलह पदार्थ कहे गय हैं जिनके नाम ये हैं—प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णाय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान । नैयायिकों के अनुसार विचार के जितने विषय हैं वे सब इन्हीं सोलह पदार्थों के अंतग्रत हैं । विशेष— दे॰ 'न्याय' । सांख्यदर्शन में संख्या में, पुरुष, प्रकृति और महत् आदि उसके विकारों को लेकर २५ पदार्थ हैं । दे॰ 'सांख्य' । वेदांत दर्शन के अनुसार आत्मा और अनात्मा ये ही दो पदार्थ हें । दे॰ 'वेदात' । इसके अतिरिक्त और भी अनेक विद्वानों और सांप्रदायिकों ने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अलग अलग पदार्थ माने हैं । जैसे 'रामानुजाचार्य के मत से चित्, अचित् और ईश्वर, शैव दर्शन के अनुसार पति, पशु और पाश (यहाँ पति का तात्पर्य शिव, पशु का जीवात्मा और पाश का मल, कर्म माया और रोष शक्ति है) । जैन दर्शनों में भी पदार्थ माने गय हैं परंतु उनकी संख्या आदि के संबध में बहुत मतभेद है । कौई दो पदार्थ मानता है, कोई तीन कौई पाँच, कौई सात और कौई नौ ।

३. पुराणानुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ।

४. वैद्यक में भावप्रकाश के अनुसार रस, गुण, वीर्य, विपाक और शक्ति ।

५. चीज । वस्तु ।