पपीता

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पपीता संज्ञा पुं॰ [देश॰ या कन्नड पपाया] एक प्रसिद्ध वृक्ष जो बहुधा बगीचों में लगाया जाता है । पपैया । अंडखरबूजा । वातकुंभ । एरंडचिर्भिट । नलिकादल । मधुकर्कटी । विशेष—इसका वृक्ष ताड़ की तरह सीधा बढ़ता है और प्रायः बिना डालियों का होता है । ऊँचाई २० फुट के लगभग होती है । पत्तियाँ इसकी अंडी की पत्तियों की तरह कटावदार होती हैं । छाल का रंग सफेद होता है । इसका फल अधिकतर लंबोतरा और कोई कोई गोल भी होता है । फल के ऊपर मोटा हरा छिलका होता है । गूदा कच्चा होने की दशा में सफेद औऱ पक जाने पर पीला होता है । बीचो बीच में काले काले बीज होते हैं । बीज और गूदे की बीच एक बहुत पतली झिल्ली होती है, जो बीजकोष या बीजाधार का काम देती है कच्चा और पक्का दोनों तरह का फल खाया जाता है । कच्चे फल की प्रायः तरकारी पकाते हैं । पक्का फल मीठा होता है और खरबूजे की तरह यों ही या शकर आदि के साथ खाया जाता है । इसके गूदे, छाल, फल और पत्ते में से भी एक प्रकार का लसदार दूध निकलता है जिसमें भोज्य द्रव्यों, विशेषतः मांस के गलाने का गुण माना जाता है । इस ी कारण इसको मांस के साथ प्रायः पकाते हैं । यहाँ तक माना जाता है कि यदि माँस थोड़ी देर तक इसके पत्ते में लपेटा रका रहे तो भी बहुत कुछ गल जाता है । इसके अध- पके फल से दूध एकत्र कर 'पपेन' नाम की एक औषध भी बनाई गई है जो मंदाग्नि में उपकारक होती है । फल भी पाचन-गुण-विशिष्ट समझा जाता है और अधिकतर इसी गुण के लिये इसे खाते हैं । पीपते का देश दक्षिण अमेरिका है । अन्यान्य देशों में यह पुर्तगालियों के संसर्ग से आया और कुछ ही बरसों में भारत के अधिकांश में फैलकर चीन पहुँच गया । इस समय विषुवत् रेखा के समीपस्थ सभी देशों में इसके वृक्ष अधिकता से पाए जाते हैं । भारत में इसके दो भेद दिखाई पड़ते हैं । एक का फल अधिक बड़ा और मीठा होता है, दूसरे का छोटा और कम मीठा । पहले प्रकार का पपीता प्रायः आसाम के गोहाटी और छोटा नागपुर विभाग के हजारीबाग स्थानों में होता है । वैद्यक में इसको मधुर, स्निग्ध, वातनाशक, वीर्य और कफ का भड़ानेवाला हृदय को हितकर और उन्माद तथा वर्ध्म रोगों का नाश लिखा है ।