पशम

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पशम संज्ञा स्त्री॰ [फा॰ पश्म]

१. बहुत बढ़िया और मुलायम ऊन जो प्रायः पंजाब, कश्मीर और तिब्बत की बकरियों से उतरता है और जिससे बढ़िया दुशाले और पशमीने बनते हैं । विशेष— कश्मीर, तिब्बत और नैपाल आदि ठंढ़े देशों की बकरियों में उनके रोएँ के नीचे की तह में और एक प्रकार के बहुत मुलायम, चिकने और बारीक रोएँ होते है जिन्हें पशम कहते हैं । इसका मूल्य बहुत आधिक होता है और प्राय: बढ़िया दुशाले, चादरें और जामेवार आदि बनाने में इसका उपयोग होता है । विशेष — दे॰ 'ऊन' ।

२. पुरूष या स्त्री की मूत्रेंद्रिय पर के बाल । उपस्थ पर के बाल । शष्प । झाँट । मुहा॰— पशम उखाड़ना = (१) व्यर्थ समय नष्ट करना । (२) कुछ भी हानि या कष्ट न पहुँचा सकना । पशम न उखड़ना = (१) कुछ भी काम न हो सकना । (२) कुछ भी कष्ट या हानि न होना । पशम पर मारना = बिलकुल तुच्छ समझना । पशम न समझना = कुछ भी न समझना । पशम के बराबर भी न समझना ।

३. बहुत ही तुच्छ वस्तु ।