पाई

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पाई ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ पाद, हिं॰ पाय]

१. किसी एक ही निश्चित घेरे या मंडल में नाचने या चलने की क्रिया । मंडल घूमना । गोड़ापाही । उ॰—नीर के निकट रेणु रंजित लसै यो तट एक पट चादर की चाँदनी बिछाई सी । कहैं पदमाकर त्यौं करत कलोल लोक आवरत पूरे राजमंडल की पाई सी ।—पद्माकर (शब्द॰) । ष

२. पतली छड़ियों या बेतों का बना हुआ जोलाहों का एक ढाँचा जिसपर ताने के सूत को फैलाकर उसे खूब माजते हैं । टिकठी । अड्डा । मुहा॰—पाई करना = पाई पर फैले हुए ताने को कूँची से माँजना ।

३. घोड़ों की एक बीमारी जिसमें उनके पैर सूज जाते हैं और वे चल नहीं सकते ।

४. एक पुराना छोटा सिक्का जो आने का १२वाँ, या एक पैसे का तीसरा भाग होता था ।

५. एक पैसा । (क्व॰) ।

६. छो़टी सीधी लकीर जो किसी संख्या के आगे लगाने से इकाई का चतुर्थांश प्रकट करती है, जैसे ४ । से चार ओर एक इकाई का चौथा भाग, अर्थात् सवा चार ।

७. दीर्घ आकार सूचक मात्रा जिसे अक्षर को दीर्घ करने के लिये लगाते है, जैसे,—क से का, द से दा ।

८. छोटी खड़ी रेखा जो किसी वाक्य के अंत में पूर्ण विराम सूचित करने के लिये लगाई जाती है ।

पाई ^२ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ पाया ( = पाई कीड़ा)] एक छोटा लंबा कीड़ा जो घुन की तरह अन्न को, विशेषतः धान को, खा जाता अथवा खराब कराता है और उसे जमने योग्य नहीं रहने देता । क्रि॰ प्र॰—लगना ।