पार

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पार ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. किसी दूर तक फैली हुई वस्तु के विशेषतः नदी, समुद्र, झील, ताल आदि जलाशयों के आमने सामने के दोनों किनारों में उस किनारे से भिन्न किनारा जहाँ (या जिसकी ओर) अपनी स्थिति हो । दूसरी ओर का किनारा । अपर तट की सीमा । जैसे,— (क) यह नाव पार जायगी । (ख) जंगल के पार गाँव मिलेगा । (ग) वे पार से आ रेह हैं । (घ) नदी पार के आम अच्छे होते हैं । उ॰— अंगद कहइ जाऊँ मैं पारा । जिय संसय कछु फिरती बारा ।— तुलसी (शब्द॰) । विशेष— इस शब्द के साथ सप्तमी की विभक्ति 'मे' प्रायः लुप्त ही रहती है, इससे इसका प्रयोग अव्ययवत् ही जान पड़ता है । यौ॰— आरपार = (१) यह किनारा और वह किनारा । (२) इस किनारे से उस किनारे तक । जैसे,— नाले के आरपार लकड़ी का एक बल्ला रख दो । वारपार = यह किनारा और वह किनारा । जैसे,— जब नाव बीच धार में पहुँची तव वार- पार नहीं सूझता था । मुहा॰—पार उतरना = (१) नदी आदि के बीच से होते हुए दूसरे किनारे पर पहुँचना । (२) जिस काम में लगे रहे हों उसे पूरा कर चुकना । किसी काम से छुट्टी पाना । (३) मतलब को पहुँचना । सिद्धि या सफलता प्राप्त करना । (४०) मरकर समाप्त होना । मर मिटना (स्त्री॰) । पार उतर जाना = दे॰ 'पार उतरना' (१), (२), (३), (४) और (५) । मतलब साधकर अलग हो जाना । किनारे हो जाना । जैसे,— तुम तो ले देकर पार उतर गए, बोझ मेरे सिर पड़ा । पार उतारना = (१) दूसरे किनारे पर पहुँचाना । जल आदि के ऊपर का रास्ता तै कराना । (२) पूरा कर चुकना । समाप्ति पर पहुँचाना । (३) उद्धार करना । दुःख या कष्ट से बाहर करना । उबारना । उ॰— रघुबर पार उतारिए, अपनी ओर निहारि ।—(शब्द॰) । (४) समाप्त करना । ठिकाने लगाना । मार डालना । (नदी आदि) पार करना= (१) नदी आदि के बीच से होते हुए उसके दूसरे किनारे पर पहुँचना । जल आदि का मार्ग तै करना । (२) पूरा करना । समाप्ति पर पहुँचना । तै करना । निबटाना । भुगताना । (३) निबाहना । बिताना । जैसे, जिंदगी पार करना । (किसी वस्तु या व्यक्ति को, नदी आदि के) पार करना = (१) नदी आदि के बीच से ले जाकर दूसरे किनारे पर पहुँचाना । जैसे, नाव को पार करना, किसी आदमी को पार करना । (२) दुर्गम मार्ग तै कराना । (३) कष्ट या दुःख के बाहर करना । उद्धार करना । पार लगना = नदी आदि के बीच से होते हुए उसके दूसरे किनारे पर पहुँचना । किसी का पार लगना = निर्वाह होना । जीवन के दिन काटना । कालक्षेप होना । जैसे,— तुम्हारा कैसे पार लगेगा? (इस मुहा॰ में 'बेड़ा' शब्द लुप्त समझना चाहिए) । किसी से पार लगना = पूरा हो सकना । हो सकना । जैसे— तुम्हारा काम हमसे नहीं पार लगेगा । पार लाना = (१) किसी वस्तु के बीच से ले जाकर उसके दूसरे किनारे पर पहुँचाना । उ॰— हरि मोरी नैया पार लगा ।— गीत (शब्द॰) । (२) कष्ट या दुःख के बाहर करना । उद्धार करना । जैसे,— ईश्वर ही पार लगावे । (२) पूरा करना । समाप्ति पर पहुँचाना । खतम करना । जैसे,— किसी प्रकार इस काम को पार लगाओ । किसी का पार लगाना = निर्वाह करना । जीवन व्यतीत कराना । पार होना = (१) किसी दूर तक फैली हुई वस्तु के बीच से होते हुए उसके दूसरे किनारे पर पुहँचना । जैसे, नदी पार होना, जंगल पार होना । (२) किसी काम को पूरा कर चुकना । किसी काम से छुट्टी ग जाना । (३) मतलब साधकर अलग हो जाना । जैसे,— तुम तो अपना ले देकर पार हो जाओ काम चाहे हो या न हो । पार हो जाना= दे॰ 'पार होना' — (१), (२) और (३) । (४) छुट्टी पा जाना । मुक्त हो जाना । रिहाई पा जाना । फँसाव, झंझट, जवाबदेही आदि से छूट जाना । निकल जाना । जैसे— तुम तो दूसरों के सिर दोष मढ़कर पार हो जाओगे । लड़की पार होना = लड़की का ब्याह हो जाना । कन्या के बिवाह से छुट्टी पा जाना ।

२. सामनेवाला दूसरा पार्श्व । दूसरी तरफ । जैसे— (क) तीर कलेजे से पार होना । (ख) गेंद का दीवार के पार जाना । यौ॰— आर पार = किसी वस्तु से होता हुआ उसके इस ओर से उस ओर तक । किसी वस्तु के ऊपर, नीचे या भीतर से होत ा हुआ उसकी एक तरफ से दूसरी तरफ तक । जैसे,— (क) दीवार के आरपार छेद हो गया । (ख) यह सड़क पहाड़ के आरपार गई है । (ग) बाँध के आरपार सुरंग खोदी गई । मुहा॰— पार करना = किसी वस्तु के ऊपर, नीचे या भीतर से होते हुए उसकी दूसरी ओर पहुँचना । किसी वस्तु से होते हुए उसके आगे निकल जाना । लाँघते, भेदते या ऊपर से होते हुए दूसरे पार्श्व में जाना । जैसे, (क) मनुष्य या रास्ते का पहाड़ को पार करना । (ख) गेंद का दीवार को पार करना (ग) सुरंग का बाँध को पार करके निकलना । (घ) तीर का कलेजे को पार करना । विशेष— यदि कोई दूसरे मार्ग से जहाँ वह वस्तु न पड़ती हो जाकर उस वस्तु की दूसरी ओर पहुँच जाय तो उसे पार करना न कहेंगे । पार करने का अभिप्राय है वस्तु से होकर उसकी दूसरी तरफ पहुँचना । (किसी वस्तु को दूसरी वस्तु के) पार करना = (१) किसी वस्तु के ऊपर, नीचे या भीतर से ले जाकर उसको दूसरी ओर पूहँचाना । लँघाकर या घुसाकर दूसरी ओर निकालना या जे जाना । जैसे,— (क) इस अंधे को हाथ पकड़ाकर टीले के पार कर दो । (ख) इस बार तीर पेड़ के पार कर देंगे । (ग) भाला कलेजे के पार कर दिया । (२) कष्ट या दुःख से बाहर करना । उबारना । उद्धार करना । जैसे,— किसी प्रकार इस विपत्ति से पार करो । पार होना= किसी वस्तु के ऊपर, नीचे या भातर से होते हुए उसकी दूसरी ओर पहुँचना । किसी वस्तु पर से जाकर, उसे लाँघकर या उसमें घुसकर उसकी दूसरी तरफ निकलना । जैसे, (क) गेंद का दीवार के पार होना । (ख) कटार का कलेजे के पार होना । उ॰— इत मुख तें गग्गा कढ़ी उतै कढ़ी जमधार । 'वार' कहन पायो नहीं, भई करेजे पार । (शब्द॰) ।

३. आमने सामने के दोनों किनारों में से एक दूसरे की अपेक्षा से कोई एक । किसी वस्तु के पूरे विस्तार के बीचोबीच से गई हुई कल्पित रेखा के दोनों छोरों पर पड़नेवाले तटों या पार्श्वों में से कोई एक । ओर । तरफ । जैसे,— (क) नदी के इस पार से उस पार तुम नहीं जा सकते । (ख) दीवार में इस पार से उस पार तक छेद हो गया । (ग) जब पोस्ती ने पी पोस्त तब कूँड़ी के इस पार या उस पार ।— हरिश्चंद्र (शब्द॰) । विशेष— इस शब्द का प्रयोग उसी किनारे या पार्श्व के अर्थ में होगा जिसका कथन सामने के दूसरे किनारे या पार्श्व का संबंध लिए हुए होगा । जैसे, इस पार कहने से यह समझा जाता है कि कहनेवाले के ध्यान में दोनों किनारे हैं जिनमें से वह एक ही ओर इंगित करता है । यही कारण है, जिससे 'इस' और 'उस' की जगह 'एक' और 'दो' संख्यावाचक पदों का प्रयोग इस शब्द के पहले नहीं करते । 'एक पार से दूसरे पार तक' नहीं बोला जाता । इसी प्रकार दोनों 'किनारे' के अर्थ में 'दोनों पार' बोलना भी ठीक नहीं जान पड़ता । संख्यावाचक शब्द तब रख सकते जब 'पार' का व्यवहार सामान्यतः (बिना किसी विशेषता के) 'किनारा' के अर्थ में होता है । पर उसका प्रयोग सापेक्ष है ।

४. छोर । अंत । अखीर । हद । परिमिति । मुहा॰— पार पाना = अंत तक पहुँचना । समाप्ति तक पहुँचना । आदि से अंत तक जाना या पूरा करना । क॰— शेष शारदा सहस श्रुति कहत न पावैं पार ।— तुलसी (शब्द॰) । किसी से पार पाना= किसी के विरुद्ध सफलता प्राप्त करना । जीतना जैसे,— वह बड़ा चालाक है, तुम उससे नहीं पार पा सकते ।

पार ^२ अव्य॰ परे । आगे । दूर । लगाव से अलग । उ॰— विप्र, धेनु, सुर, संत हित लीन्ह मनुज अवतार । निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ।— तुलसी (शब्द॰) ।

पार ^३ वि॰ [सं॰ पर] अन्य । पर । पराया । दे॰ 'पर' । उ॰— पार कइ सेवइ राज दुवार ।— वी॰ रासो॰, पृ॰ ६९ ।