पारा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पारा ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰] एक नदी जो पारियात्र पर्वत से उत्पन्न कही गई है [को॰] ।

पारा ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ पारद] चाँदी की तरह सफेद, और चमकीली एक धातु जो साधारण गरमी या सरदी में द्रव अवस्था में रहती है । विशेष— खूब सरदी पाकर पारा जमकर ठोस हो जाता है । यह कभी कभी खानों में विशुद्ध रूप में भी बहुत सा मिल जाता है, पर अधिकतर और द्रव्यों के साथ मिला हुआ पाया जाता है । जैसे, गंधक और पारा मिला हुआ जो द्रव्य मिलता है उसे ईंगुर कहते हैं । गंधक और पारा ईंगुर से अलग कर दिए जाते हैं । पारा पृथ्वी पर के बहुत कम प्रदेशों में मिलता है । भारतवर्ष में पारे की खानें अधिक नहीं हैं, केबल नैपाल में हैं । अधिकतर पारा चीन, जापान और स्पेन से ही यहाँ आता है । पारा यद्यपि द्रव अवस्था में रहता है, तथापि बहुत भारी होता है । ईंगुर से पारा निकालने में स्वेदनविधि काम में लाई जाती है । ईंगुर का टुकड़ा तेज गरमी द्वारा भाप के रूप में कर दिया जाता है जिससे विशुद्ध पारे के परमाणु अलग हो जाते हैं । भाप रूप में फिर पारा अपने असली द्रव रूप में लाया जाता है । पारा बहुत से कामों में आता है । इसके द्वारा खान से निकले हुए अनेकद्रव्यमिश्रित खडों से सोना चाँदी आदि बहुमूल्य धातुएँ अलग करके निकाली जाती हैं । यह इस प्रकार किया जाता है कि खंड या टुकडे़ का चूर्णं कर लेते हैं, फिर उसके साथ युक्ति से पारे का संसर्ग करते हैं । इससे यह होता है कि सोने या चाँदी के परमाणु पारे के साथ मिल जाते हैं ।

पारा ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰ पारि (=प्याला)] दीए के आकार का पर उससे बड़ा मिट्टी का बरतन । परई ।

पारा ^३ संज्ञा पुं॰ [फा॰ पारह]

१. टुकडा ।

२. वह छोटी दीवार जो चूने गारे से जोड़कर न बनी हो, केवल पत्थरों के टुकडे़ एक दूसरे पर रखकर बनाई गई हो । ऐसी दीवार प्रायः बगीचे आदि की रक्षा के लिये चारो ओर बनाई जाती है ।

पारा ^४ पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ पाराशर] दे॰ 'पाराशर' । उ॰— पारा ऋषि मछोदरी ते कामक्रीड़ा करी । कृस्न गोपिन के संग भीना ।— कबीर रे॰, पृ॰ ४५ ।