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प्रेम

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

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शब्दसागर

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प्रेम । लगन । अनुराग । आसक्ति । उ॰—गम बहुत दुनिया में है पर इश्क का गम और है । है इसी आलम में लेकिन उनका आलम और है ।—कविता कौ॰, भा॰ ४, पृ॰ २२८ । यौ॰—इश्कमजाजी=लौकिक प्रेम । वासनायुक्त प्रेम । इश्क- हकीकी=आध्यात्मिक प्रेम । ईश्वर के प्रति प्रेम ।

प्रेम संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वह मनोवृत्ति जिसके अनुसार किसी वस्तु या व्यक्ति आदि के संबंध में यह इच्छा होती है कि वह सदा हमारे पास या हमारे साथ रहे, उसकी वृद्धि, उन्नति या हित ही अथवा हम उसका भोग करें । वह भाव जिसके अनुसार किसी दृष्टि से अच्छी जान पड़नेवाली किसी चीज या व्यक्ति को देखने, पाने, भोगने, अपने पास रखने अथवा रक्षित करने की इच्छा हो । स्नेह । मुहब्बत । अनुराग । प्रीति । विशेष— परम शुद्ध और विस्तृत अर्थ में प्रेम ईश्वर का ही एक रूप माना जाता है । इसलिये अधिकांश धर्मों के अनुसार प्रेम ही ईश्वर अथवा परम धर्म कहा गया है । हमारे यहाँ शास्त्रों में प्रेम अनिवर्चनीय कहा गया है और उसे भक्ति का दूसरा रूप और मोक्षप्राप्ति का साधन बतलाया है । मुमुक्षुओं के लिये शुद्ध प्रेमभाव का ही विधान है । शास्त्रों में, और विशेषतः वैष्णव साहित्य में, इस प्रेम के अनेक भेद किए गए हैं । साहित्य में प्रेम, रति या प्रिति के तीन प्रकार माने गए हैं—(१) उत्तम, वह जिसमें प्रेम सदा एक सा बना रहे । जैसे, ईश्वर के प्रति भक्त का प्रेम । (२) मध्यम, जो अकारण हो । जैसे, मित्रों का प्रेम और (३) अधम, जो केवल स्वार्थ के कारण हो ।

२. स्त्री जाति और पुरुष जाति के ऐसे जीवों का, पारस्परिक स्नेह जो बहुधा रूप, गुण, स्वभाव, सान्निध्य अथाव कामवासना के कारण होता है । प्यार । मुहब्बत । प्रीति । जैसे— (क) वे अपनी स्त्री से अधिक प्रेम करते हैं । (ख) उस विधवा का एक नौकर के साथ प्रेम था ।

३. केशव के अनुसार एक अलंकार ।

४. माया और लोभ ।

५. कृपा । दया । उ॰— अतिहि आनंद कंद बानि हूँ सुनावै । सतगुरू जब दया जानि प्रेम हूँ लगावै ।— गुलाल॰, पृ॰, ३५ ।

६. क्रीड़ा । नर्म (को॰) ।

७. हर्ष । आनंद (को॰) ।

८. विनोद (को॰) ।

९. वायु । हवा (को॰) ।

१०. इंद्र (को॰) ।