फरक

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

फरक † ^१ क्रि॰ वि॰ [सं॰ पराक्] दूर । अलग । परे । उ॰—कोउ पत्र पवन तें बाजै । मृग चौकि फरक हो भाजै ।—सुंदर॰ ग्रं॰ भा॰ १, पृ॰ १४१ ।

फरक ^२ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰ फरकना]

१. फरकने का भाव ।

२. फरकने की क्रिया ।

३. फुरती से उछलने कूदने की चेष्टा । चंचलता । फड़क । उ॰—मृगनैनी दृग की फरक, उर उछाह, तन फूल । बिनही पिय आगम उमगि पलटन लगी दुकूल ।—बिहारी र॰, दो॰ २२२ ।

फरक ^३ संज्ञा पुं॰ [अ॰ फरक]

१. पार्थक्य । पृथकत्व । अलगाव ।

२. दो वस्तुओं के बीच का अंतर । दूरी । मुहा॰—फरक फरक होना = 'दूर हो' या 'राह छोड़ो' की आवाज होना । 'हटो बचो' होना । उ॰—चल्यो राजमंदिर की ओरा । फरक फरक माच्यो मग सोरा ।—रघुराज (शब्द॰) ।

३. भेद । अंतर । जैसे,—(क) इसमें और उसमें बड़ा फरक है । (ख) बात में फरक न पड़ने पावे । (ग) उन्हें अपने और पराए का फरक नहीं मालूम है ।

४. दुराव । परायापन । अन्यता ।

५. कमी । कसर । जैसे,—(क) उसकी तोल में फरक नहीं है । (ख) घोड़े की असलियत में फरक मालूम होता है ।