फेफड़ा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

फेफड़ा संज्ञा पुं॰ [सं॰ फुप्फुस + हि॰ ड़ा (प्रत्य॰)] शरीर के भीतर थैली के आकार का वह अवयव जिसकी क्रिया से जीव साँस लेते हैं । वक्षआशय के भीतर श्वास प्रश्वास का विधान करनेवाला कोश । साँस की थैली जो छाती के निचे होती है । फुप्फुस । विशेष—वक्षआशय के भीतर वायुनाल में थोडी़ दूर नीचे जाकर इधर उधर दो कनखे फूटें रहते हैं जिनसे लगा हुआ मांस का एक एक लोथड़ा दोनों ओर रहता है । थैली के रूप के ये ही दोनों छिद्रमय लोथडे़ दाहिने ओर बाएँ फेफडे़ कहलाते हैं । दहिना फेफड़ा बाएँ फेफडे़ की अपेक्षा चौड़ा और भारी होता है । फेफडे़ का आकार बीच से कटी हुई नारंगी की फाँक का सा होता है जिसका नुकिला सिरा ऊपर की ओर होता है । फेफडे़ का निचला चौड़ा भाग उस परदे पर रखा होता है जो उदराशय को वक्षआशय से अलग करता है । दाहिने फेफडे़ में दो दरारें होती है जिनके कारण वह तीन भागों में विभक्त दिखाई पड़ता है पर बाएँ में एक ही दरार होती है जिससे वह दो ही भागों में बँटा दिखाई पड़ता है । फेफडे़ चिकने और चमकीले होते हैं और उनपर कुछ चित्तियाँ सी पडी़ होती है । प्रौढ मनुष्य के फेफडे़ का रंग कुछ नीलापन लिए भूरा होता है । गर्भस्थ शिशु के फेफडे़ का रंग गहरा लाल होता है जो जन्म के उपारंत गुलाबी रहता है । दोनों फेफड़ों का वजन सवा सेर के लगभग होता है । स्वस्थ मनुष्य के फेफडे़ वायु से भरे रहने के कारण जल से हलके होते हैं और पानी में नहीं डूबते । परंतु जिन्हें न्यूमोनिया, क्षय आदि बीमारियाँ होती है उनके फेफडे का रुग्ण भाग ठोस हो जाता है और पानी में डालने से डूब जाता है । गर्भ के भीतर बच्चा साँस नहीं लेता इससे उसका फेफड़ा पानी में डूब जायगा, पर जो बच्चा पैदा होकर कुछ भी जिया है उसका फेफड़ा पानी में नहीं डूबेगा । जीव साँस द्वारा जो हवा खींचते हैं वह श्वासनाल द्वारा फेफडे में पहुँचती हैं । इस टेंटुवे के निचे थोडी दूर जाकर श्वासनाल के इधर उधर दो कनखे फूटे रहते हैं जिन्हें दाहनी और बाई वायुप्रणालियाँ कहते हैं । फेफडे़ के भीतर घुसते ही ये वायुप्रणालियाँ उत्तरोत्तर बहुत सी शाखाओं में विभक्त होती जाती हैं । फेफडे़ में पहुँचने के पहले वायुप्रणाली लचीली हड्डी के छल्लों के रुप में रहती है पर भीतर जाकर ज्यों ज्यों शाखाओं में विभक्त होती जाती है त्यों त्यों शाखाएँ पतली और सूत रूप में होती जाती है, यहाँ तक कि ये शाखाएँ फेफडे़ के सब भागों में जाल की तरह फैली रहती हैं । इन्हीं के द्वारा साँस से खींची हुई वायु फेफडे़ के सब भागों में पहुँचती हैं । फेफडे़ के बहुत से छोटे छोटे विभाग होते है । प्रत्येक विभाग को सूक्ष्म आकार का फेफड़ा ही समझिए जिसमें कई घर होते हैं । ये घर वायुमंदिर कहलाते हैं और कोठों में बँटे होते हैं । इन कोठों के बीच सूक्ष्म वायुप्रणालियाँ होती है । नाक से खींची हुई वायु जो भीतर जाती है, उसे श्वास कहते हैं । जो वाय नाक से बाहर निकाली जाती है उसे प्रश्वास कहत े हैं । भीतर जो साँस खींची जाती है उसमें कारबन, जलबाष्प तथा अन्य हानिकारक पदार्थ बहुत कम मात्रा में होते हैं और आक्सीजन गैस, जो प्राणियों के लिये आवश्यक है, अधिक मात्रा में होती है पर, भीतर से जो साँस बाहर आती है उसमें कारबन या अगारक वायु अधिक और आक्सीजन कम रहती है । शरीर के भीतर जो अनेक रासायनिक क्रियाएँ होती रहती हैं उनके कारण जहरीली कारबन गैस बनती रहती है । इस गैत के कारण रक्त का रंग कालापन लिए हो जाता है । यह काला रक्त शरीर के सब भागों से इकट्ठा होकर दो महाशिराओं के द्वारा हृदय के दाहने कोठे में पहुँचता हैं । हृदय से यह दूषित रक्त फुप्फुमीय धमनी (दे॰ 'नाडी') द्वारा दोनों फेफड़ों में आ जाता है । वहाँ रक्त की बहुत सी कारबन गैस बाहर निकल जाती है और उसकी जगह आक्सिजन आ जाता है, इस प्रकार फेफड़ों में जाकर रक्त शुद्ध हो जाता है । लाल शुद्ध होकर फिर वह हृदय में पहुँचता है और वहाँ से धमनियों द्वारा सारे शरीर में फैलकर शरीर को स्वस्थ रखता हैं ।