बकना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बकना क्रि॰ सं॰ [सं॰ बचन]

१. ऊटपटाँग बात कहना । अयुक्त बात बोलना । व्यर्त बहुत बोलना । उ॰— (क) जेहि धरि सखी उठावहिं सीस बिकल नहि डोल । घर कोई जीव न जानइ मुखरे बकत कुबोल ।— जायसी (शब्द॰) । (ख) बाद ही बाढ़ नदी के बकै मति बोर दे वज विषय विष ही को । पद्माकर (शब्द॰) ।

२. प्रलाप करना । बड़बड़ाना । उ॰—(क) काजी तुम कौन किताब बखाना । झंखत बकत रह्यो निशि बासर मत एकी नहि जाना ।—कबीर (शब्द॰) । (ख) नाहिन केशव साख जिन्हें बकि के तिनसों दुखवै मुख कोरी ।— केशव (शब्द॰) । सयो॰ क्रि—चलाना ।—जाना ।—डालना । मुहा॰— बकना झकना = बड़बडाना । बिगड़कर व्यथ की बातें करना । †

३. कहना । वर्णान करना । उ॰— वकूँ जिका ज्यारी विगत, अवर न कोय उपाय ।—रघु रू॰, पृ॰ १३ ।