बगर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बगर पु † संज्ञा पुं॰ [सं॰ प्रघण॰, पा पघण]

१. महल । प्रासाद ।

२. बड़ा मकान । घर । उ॰—(क) आस पास वा बगर के जहँ बिहरत पशु छद । ब्रज बड़े गोप परजन्य सुत नोके श्री मव नंद ।—नाभा (शब्द॰) । (ख) गोपिन के अँसुवन भरी सदा उसोस अपार । डगर डगर नै ह्वै रही बगर बगर के बार ।— बिहारी (शब्द॰) ।

३. घर । कोठरी । उ॰— (क) टटकी धोई धोवती, चटकीली मुख जोति । फिरति रसोई के बगर जगर मगर दुति होति ।—बिहारी (शब्द॰) । (ख) जगर जगर दुति दूनी केलि मंदिर में, बगर बगर धूप अगर बगारे तू ।— पद्माकर (शब्द॰) ।

१. द्वार के सामने का सहन । आँगन । उ॰—(क) नंद महर के बगर तन अब मेरे को लाय । नाहक कहुँ गड़ि जायगो हित काँटो मन पाय ।—रसखान (शब्द॰) । (ख) राम डर रावन के बगर डगर घर बगर बगर आजु कथा भाजि जानकी ।— हनुमान (शब्द॰) ।

५. वह स्थान जहाँ गाएँ बाँधी । जाती है । बगार । घाटी । उ॰—(क) नगर बसे नगरे लगे सुनिए लागर नारि । पगरे रगरे सुमन के डारे बगर बहारि ।— रसनिधि (शब्द॰) । (ख) भोर उठि नित्य प्रति मोंसों करत है झगरो । ग्वाव बाल संग लिए सब घेरि रहै बगरी ।—सूर (शब्द॰) । ‡

६. पशुसमूहा । पशुओं का झुंड ।

बगर ^२ संज्ञा स्त्री॰ [हिं॰] 'बगल' । उ॰— तसवा की सरिया में सोने कै किनरिया सजरिया करत मुख जोति । अगर बगर जरतरवा लगाल बाँड़े जगर मगर दुति होति ।—बिरहा (शब्द॰) ।