बल

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बल ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. शक्ति । सामर्थ्य । ताकत । जोर । बूता । पर्या॰—पराक्रम । शक्ति । वीर्य । मुहा॰—बलभरना=बल दिखाना । जोर दिखाना । जोर करना । बल की लेना=इतराना । घमंड करना ।

२. भार उठाने की शक्ति । सँभार । सह ।

३. आश्रय । सहारा । जैसे, हाथ के बल, सिर के बल, इत्यादि ।

४. आसरा । भरोसा । बिर्ता । उ॰—(क) जो अंतहु अस करतब रहेऊ । माँगु माँगु तुम्ह केहि बल कहेऊ ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) कत सिख देइ हमहि कोउ माई । गालु करब केहि कर बल पाई ।—तुलसी (शब्द॰) ।

५. सेना । फौज ।

६. बलदेव । बलराम ।

७. एक राक्षस का नाम ।

८. बरुण नामक वृक्ष ।

९. सत्य (को॰) ।

१०. काम (को॰) ।

११. पुरुष तेज । शुक्र (को॰) ।

१२. ओषधि (को॰) ।

१३. मोटाई । स्थूलता (को॰) ।

१४. रक्त (को॰) ।

१५. काक, कौआ (को॰) ।

१६. हाथ (को॰) ।

१७. पार्श्व । पहलू । जैसे, दहने बल, बाएँ बल ।

बल ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ बलि (=झुर्री मरोड़) अयवा वलय] ऐंठन । मरोड़ । वह चक्कर या घुमाव जो किसी लचीली या नरम वस्तु को बढ़ाने या घुमाने से बीच बीच में पड़ जाय । पेच । क्रि॰ प्र॰—पड़ना ।—होना । मुहा॰—बल खाना=ऐंठ जाना । पेच खाना । बटने या घुमाने से घुमावदार हो जाना । बल देना= (१) ऐंठना । मरोड़ना । (२) बटना ।

२. फेरा । लपेट । जैसे,—कई बल बाँधोगे तब यह न छूटेगा ।

३. लहरदार घुमाव । गोलापन लिए वह टेढ़ापन जो कुछ दूर तक चला गया हो । पेच । क्रि॰ प्र॰—पड़ना । मुहा॰—बल खाना=घुमाव के साथ टेढ़ा होना । कुंचित होना । उ॰—कंधे पर सुंदरता के साथ बनाई गई काल साँपनी ऐसी बल खाती हिलती मन मोहनेवाली चोटी थी ।—अयोध्या सिंह (शब्द॰) ।

४. टेढ़ापन । कज । खम । जैसे,—इस छड़ी में जो बल है वह हम निकाल देंगे । मुहा॰—बल निकालना=टेढ़ापन दूर करना ।

५. सुकड़न । शिकन । गुलझट । क्रि॰ प्र॰—पड़ना ।

६. लचक । झुकाव । सीधा न रहकर बीच से झुकने की मु्द्रा । मुहा॰—बल खाना=लचकना । झुकना । उ॰—(क) पतली कमर बल खाती जाति (गीत) । (ख) बल खात दिग्गज कोल कूरम शेष सिरग हालति मही ।—विश्राम (शब्द॰) ।

७. कज । कसर । कमी । अंतर । फर्क । जैसे,—(क) पाँच रुपए का बंल पड़ता है नहीं तो इतने में मैं आपके हाथ वेच देता । (ख) इसमें उसमें बहुत बल हैं । मुहा॰—बल खाना=घाटा सहना । हानि सहना । खर्च करना । जैसे,—बिना कुछ बल खाए यहाँ काम न होगा । बल पड़ना=(१) अंतर होना । फर्क रहना । (२) कमी वा घाटा होना ।

८. अधपके जौ की बाल ।

बल पु ^३ अव्य [हिं॰] तरफ । ओर । उ॰—साँवला । सोहन मोहन गमरू इत बल आइ गया ।—घनानंद, पृ॰ ४४ ।

बल † ^४ संज्ञा पुं॰ [हिं॰] 'बाल' शब्द का समासगत रूप । जैसे, बलटुट और बलतोड़ ।