बाजार

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बाजार संज्ञा पुं॰ [फ़ा॰ बाजार]

१. वह स्थान जहाँ अनेक प्रकार के पदार्थों को दुकानें हों । वह जगह जहाँ सब तरह की चीजों की, अथवा किसी एक तरह की चीज की बहुत सी दूकानें हों ।

२. भाव । मूल्य । मुहा॰—बाजार करना = चीजें खरीदने के लिये बाजार जाना । बजार गर्म होना = (१) बाजार में चीजों या ग्राहकों आदि की अधिकता होना । खूब लेन देन या खरीद बिक्री होना । (२) खूब काम चलना । काम जोरों पर होना । जैसे,— आजकल गिरपतरियों का बाजार गर्म है । बाजार तेज होना = (१) बाजार में किसी चीज की माँग बहुत होना । ग्राहकों की अधिकता होना । (२) किसी चीज का मूल्य वृदि्ध पर होना । (३) काम जोरों पर होना । खूब काम चलना । बाजार मंद या मदा होना = (१) बाजार मे किसी चीज की माँग कम होना । ग्राहकों की कमी होना । (२) किसी पदार्थ के मूल्य में निरंतर ह्रास होना । दाम घटना । (३) कारबार कम चलना । बाजर लगाना = बहूत सी चीजों का इधर उधर ढेर लगना । बहुत सी चीजों का यों ही सामने रखा होना । बाजार लगाना = चीजों को इधर उधर फैला देना । अटाला लगाना । यौ॰—बाजार भाव = वह मूल्य जिसपर कोई चीज बाजार में मिलती या बिकती है । प्रचलित मूल्य । वह स्थान जहाँ किसी निश्चित समय, तिथि, वार या अवसर आदि पर सब तरह की दूकानें लगती हों । हाठ । पैठ । मुहा॰—बाजार लगना = बाजार में दूकानों का खुलना ।