बादल

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

पु.

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बादल संज्ञा पुं॰ [सं॰ वारिद, (वर्ण वि॰) > हि॰ बादर]

१. पृथ्वी पर के जल (समुद्र, झील, नदी आदि के) से उठी हुई वह भाप जो घनी होकर आकाश में छा जाती है और फिर पानी की बूँदों के रूप में गिरती है । मेघ । घन । विशेष— सूक्ष्म जलसीकर रूप की इस प्रकार की भाप जो पृथ्वी पर छा जाती है, उसे नीहार या कुहरा कहते हैं । बादल साधारणतः पृथ्वी से ड़ेढ़ कोस की उँचाई पर रहा करते हैं । ये आकाश में अनेक विलक्षण रूप रंग धारण किया करते हैं जिनकी शोभा अनिर्वचनीय होती है । क्रि॰ प्र॰—आना ।—छाना । मुहा॰—बादल उठना=बादलों का किसी ओर से समूह के रूप में बढ़ते बुए दिखाई पड़ना । बादल चढ़ना=दे॰ 'बादल उठना' । बादल गरजना= मेघों के संघर्ष का घोर शब्द । घरघराहठ की आवाज जो बादलों से निकलती है । बादल घिरना=मेघों का चारों ओर छाना । बादल फटना=मेघों का घटा के रूप में फैला न रहना, तितर बितर हो जाना । बादल छँटना=मेघों का खंड खंड होकर हट जाना । आकाश स्वच्छा होना । बादलों में थिगली लगाना=असंभव काम करना । कठिन काम कर डालना । बादलों से बातें करना= बहुत उँचा उठना ।

२. एक प्रकार का पत्थर जो दुधिया रंग का होता है और जिसपर बैगनी रंग की बादल की सी धारियाँ पड़ी होती हैं । यह राजपूताने में निकलता है ।

यह भी देखिए[सम्पादन]