बाहर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बाहर क्रि॰ वि॰ [सं॰ बाह्य या बहिर]

१. स्थान, पद, अवस्था या संबध आदि के विचार से किसी निश्चित अथवा कल्पित सीमा (या मर्यादा) से हटकर, अलग या निकला हुआ । भीतर या अंदर का उलटा । उ॰—तुलसी भीतर बाहरहुँ जौ चाहेसि उजियार ।—तुलसी (शब्द॰) । मुहा॰—बाहर आना या होना=सामने आना । प्रकट होना । बाहर करना=अलग करना । दूर करना । हटाना । बाहर बाहर=ऊपर ऊपर । बाहर रहते हुए । अलग से । बिना किसी को जताए । जैसे,—वे कलकत्ते से आए तो थे पर बाहर बाहर दिल्ली चले गए ।

२. किसी दूसरे स्थान पर । किसी दूसरी जगह । अन्य नगर या गाँव आदि में । जैसे,—(क) आप बाहर से कब लौटेंगे । (ग) उन्हें बाहर जाना या, तो मुझसे मिल तो लेते । उ॰— जेहि घर कंता ते सुखी तेहि गारू तेहि गर्व । कंत पियारे बाहरे हम सुख भूला सर्ब ।—जायसी (शब्द॰) । मुहा॰—बाहर का=ऐसा आदमी जिससे किसी प्रकार का संपर्क न हो । बेगाना । पराया ।

३. प्रभाव, अधिकार या संबंध आदि से अलग । जैसे,—हम आपसे किसी बात में बाहर नहीं हैं, आप जो कुछ कहेंगे, वही हम करेंगे । उ॰—साई मैं तुझ बाहरा कौड़ी हूँ नहि पाँव । जो सिर ऊपर तुम धनी महँगे मोल बिवाँव ।—कबीर (शब्द॰) ।

४. बगैर । सिवा । (क्व॰) ।

५. से अधिक । प्रभाव, शक्ति आदि से अधिक । जैसे, शक्ति से बाहर, बूते से बाहर आदि ।

बाहर ^२ संज्ञा पुं॰ [हिं॰ बाहा] वह आदमी जो कुएँ की जगत पर मोट का पानी उलटता है ।