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बीज

विक्षनरी से

संज्ञा

पेड़-पौधों में मुख्यतः फलों के अन्दर होता है, जिससे उसी तरह के अन्य पेड़-पौधे अंकुरित होकर निकलते हैं।

अनुवाद

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

बीज संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. फूलवाले वृक्षों का गर्भांड जिससे वृक्ष अकुरित होकर उत्पन्न होता हे । बीया । तुख्म । दाना । विशेष—वह गर्भांड एक छिलके मे बंद रहता है ओर इसमें अव्यक्त रूप से भावी वृक्ष का भ्रूण रहता हे । जब इस गर्भांड को उपयुक्त जलवायु ओर स्थान मिलता हे तब वह भ्रूण जिसमे अंकुर अव्यक्त रहता है, प्रबुदध होकर बढ़ता ओर अंकुर रूप में परिणत हो जाता है । यही अंकुर समय पांकर बढ़ता है ओर बढ़कर वैसा ही पेड़ हो जाता है जैसे पेड़ के गर्भांड से वह स्वयं निकला था । कि॰ प्र॰—उगना —डालना ।—बोना

२. प्रधान कारण । मूल प्रकृति ।

३. जड । मूल ।

४. हेतु । कारण ।

५. शुक्र । वीर्य ।

६. वह अव्यक्त सांकेतिक वर्ण- समुदाय वा शब्द जिसको कोई व्यक्ति जो उसके सांकेतिक भावों को न जानता हो, नहीं समझ सकता ।

७. गणित का एक भेद जिसमें अव्यक्त संख्या के सूचक संकेतों का व्यवहार होता है । दे॰—'बीजगणित' ।

८. अव्यक्त संख्यासूचक सकेत ।

९. वह अव्यक्त ध्वनि वा शब्द जिसमें तंत्रानुसार किसी देवता को प्रसन्न करने की शक्ति मानी गई हो । विशेष—भिन्न भिन्न देवताओं का भिन्न भिन्न बीजमंत्र होता है ।

१०. मंत्र का प्रधान भाग या अंग । विशेष—तंत्रानुसार मंत्र के तीन प्रधान अंग होता हैं—बीज, शक्ति और कीलक ।

११. वह भावपूर्ण सांकेतिक अव्यक्त शब्द जिसमें बहुत से भाव सूक्ष्म रूप से सन्निवेशित हों और जिसका तात्पर्य दूसरे लोग, जिन्हे सांकेतिक अर्थो का ज्ञान न हो, न जान सकें । ऐसे शब्दों का प्रयोग रासायनिक तथा इसी प्रकार के ओर कार्यो के लिये किया जाता है ।

१२. मज्जा (को॰) ।

१३. नाटक में प्रारंभ में मूल कथा की ओर संकेत । उ॰—यह रूपक राजा सूरजदेव की रानी नीलदेवी का अपने पति के प्राण के बदले में उक्त पतिप्राणहारक शत्रु का बध कर डालने के बीज पर लिया गया है ।—प्रेमघन॰, भा॰ २, पृ॰ ४२८ ।

बीज ^३ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ बिद्युत्] दे॰ 'बिजली' । उ॰—छुटयौ पट्ट पीतंबरं कट्टि छुट्टी । मनों स्याम आकास ते बीज तुट्टी ।— पृ॰ रा॰, १ । १३४ । (ख) अजहुँ शशी मुँह बीज दिखावा । चौंध परयो कछु कहै न आवा ।—जायसी (शब्द॰) ।