बैसाखी

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

बैसाखी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ विशाख (= वैसाख) (= मथानी) जिसमें शाखाएँ निकली हों)]

१. वह लाठी जिसके सिर को कंधे के नीचे बगल में रखकर लँगड़े लोग टेकते हुए चलते हैं । इसके सिरे पर जो अदर्धचंद्रकार आड़ी लकड़ी (अड्डे के आकार की) लगी होती है, वही बगल में रहती । लँगड़े के टेकने की लाठी । उ॰—(क) तिलक दुआदस मस्तक दीन्हे । हाथ कनक बैसाखी लीन्हे ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) गिरइ बुद्ध बैसाखिय कर सों । होइ सरप तेहि धरइ न डर सों ।—इंद्रा॰, पृ॰ ३३ । (ग) बैसाखी धरि कंध शस्त्रचातुरी दिखावन । किमि जीतै रनखेत बड़ी विधि सों समझावन ।—श्रीधर पाठक (शब्द॰) ।

२. वैशाख मास की पूर्णिमा ।