ब्याज

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ब्याज संज्ञा पुं॰ [सं॰ व्याज]

१. दे॰ 'व्याज' ।

२. वृद्धि । सूद । उ॰—(क) कलि का स्वामी लोभिया मनसा रहे बँधाय । देवे पैसा व्याज को लेखा करत दिन जाय । —कबीर (शब्द॰) । (ख) सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा । दिन चलि गयेउ व्याज बहु बाढा ।—तुलसी (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—जोड़ना ।—फैलाना ।—लगाना । यौ॰— ब्याजखोर = सृदखोर । ब्याज बट्टा = हानि लाभ । नफा नुकसान ।