भँगरा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

भँगरा ^१ संज्ञा पुं॰ [प्रि॰ भाँग + रा (= का)] भाँग के रेशे से बना हुआ एक प्रकार का मोटा कपडा़ जो बिछाने या बोरा बनाने के काम में आता है ।

भँगरा ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ भृड्गराज] एक प्रकार की वनस्पति जो बरसात में, विशेषकर प्रयः ऐसी जगह, जहाँ पानी का सोता बहता है, या कूएँ आदि के किनारे, उगती हे । भँगरैया । भृंगराज । विशेष—इसको पत्तियाँ लँवोतरी, नुकीली, कटावदार और मोटे दल की होती हैं, जिनका ऊपरी भाग गबरे हरे रंग का और नीचे का भाग हलके रंग का खुर्दरा होता है । इसकी पत्तियों को निचोड़ने से काले रंग का रस निकलता है । वैद्यक में इसका स्वाद कड़वा और चरपरा, प्रकृति रूखी और गरम तथा गुण कफनाशक, रक्तशोधक, नवरोग और शिर की पीडा़ को दूर करनेवाला लिखा है और इसे रसायन माना है । यह तीन प्रकार का होता है—एक पीले फूल का जिसे स्वर्ण भृंगार, हरिवास, देवप्रिय आदि कहते है; दूसरा सफेद फूल का और तीसरा काले फूल का जिसे नील भृंगराज, महानील, सुनीलज, महाभृंग, नीलपुष्प या श्यामल कहते हैं । सफेद भँगरा तो प्रयः सब जगाह और पीला भँगरा कहीं कहीं होता है; पर काले फूल का भँगरा जल्दी नहीं मिलता । यह अलभ्य है और रसायन माना गया है । लोगों का विश्वास है कि काले फूल के भँगरे के प्रयोग से सफेद पके बाल सदा के लिये काले हो जाते हैं । सफेद फूल के भँगरे की दो जातियाँ हैं— एक हरे डंठलवाली, दूसरी काले डंठलवाली । पर्या॰—मार्कव । भृंगराज । केशरंजन । रंगक । कुवेलवर्धन । भृंगार । मर्कर ।