भँवर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

भँवर संज्ञा पुं [सं॰ भ्रमर, प्रा॰ भँवर]

१. भौंरा । उ॰—कुदरत पाई खीर सो चित सों चित्त मिलाय । भँवर विलंबा कमल रस अव कैसे उड़ि जाय ।—कबीर (शब्द॰) ।

२. पानी के बहाव में वह स्थान जहाँ पानी की लहर एक केंद्र पर चक्राकार घूमती है । ऐसे स्थान पर यदि मनुष्य या नाव आदि पहुँच जाय, तो उसके डूबने की संभावना रहती है । आवर्त । चक्कर । यमकातर । उ॰—(क) तडित विनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीन । नाभि मनोहर लेत जनु जमुन भँवर छबि छीन ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) भागहु रे भागौ भैया भागनि ज्यों भाग्यो, परै भव के भवन माँझ भय को भँवर है ।—केशव (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—पड़ना ।—परना । मुहा॰—भँवर में पड़ना = चक्कर में पड़ना । घबरा जाना । उ॰—यह सुठि लहरि लहरि पर धावा । भँवर परा जिउ थाह न पादा ।—जायसी ग्रं॰, पृ॰ २८९ । यौ॰—भँबरकली । भँवरजाल । भँवरभीख ।

३. गड्ढा । गर्त । उ॰—उरज भँवरी मानो मीनमणि कांति । भृगुचरण हृदय चिह्न ये सब, जीव जल बहु भाँति ।—सूर (शब्द॰) ।