भाँग

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

भाँग ^१ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ भृङ्गा या भृङ्गी] गाँजे की जाति का एक प्रसिद्ध पौधा जिसकी पत्तियाँ मादक होती हैं और जिन्हें पीसकर लोग नशे के लिये पीते हैं । भंग । विजया । बूटी । पत्ती । उ॰— अति गह सुमर खोदाए खाए ले भाँग के गुंडा ।—कीर्ति॰, पृ॰ ४० । विशेष— यह पौधा भारत के प्रायः सभी स्थानों में और विशेषतः उत्तर भारत में इन्हीं पत्तियों के लिये बोया जाता है । नेपाल की तराई में कहीं कहीं यह आपसे आप और जगली भी होता है । पर जंगली पौधे की पत्तियाँ विशेष मादक नहीं होतीं; और इसीलिये उस पौधे का कोई उपयोग भी नहीं होता । पौधा प्रायः तीन हाथ ऊँचा होता है और पत्तियाँ किनारों पर कटावदार होती है । इस पौधे के स्त्री, पुरुष और उभवलिंग तीन भेद हैं । स्त्री बौधों की पत्तियाँ ही बहुधा पीसकर पीने के काम में आती हैं । पर कभी कभी पुरुष पौधे की पत्तियाँ भी इस काम में आती हैं । इसकी पत्तियाँ उपयुक्त समय पर उतार ली जाती है; क्योंकि यदी यह पत्तियाँ उतारी न जायँ और पौधे पर ही रहकर सूखकर पीली बड़ जायँ, तो फिर उनकी मादकता और साथ साथ उपयोगिता भी जाती रहती है । भारत के प्रायः सभी स्थानों में लोग इसकी पत्तियों को पीस और छानकर नशे के लिये पीते हैं । प्रायः इसके साथ बादाम आदि कई मसाले को मिला दिए जाते हैं । वैद्यक में इसे कफनाशक, ग्राहक, पाचक, तीक्ष्ण, गरप्र, पित्तजनक, बलवर्धक, मेधाजनक, रसायन, रुचिकारक, मलावरोधक और निद्राजनक माना गया है । मुहा॰—भाँग छानना = भाँग की पत्तियों को पीस और छानकर /?/ । भाँग खा जाना या पी जाना = नशे की सी बातें करना । नासमझी की या पागलपन की बातें करना । घर में भूजी भाँग न होना । =अत्यंत दरिद्र होना । पास में कुछ न होना । उ॰— जुरि आए फाकेमस्त होली होय रही । घर में भूजी भाँग नहीं है, तौ भी न हिम्मत पस्त । होली होय रही ।— भारतेंदु (शब्द॰) ।

भाँग ^२ संज्ञा पुं॰ [?] वैश्यों की जाति ।